भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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चाण्डालानां सहस्रे च सूरिभिस्तत्त्वदर्शिभिः। एको हि यवनः प्रोक्तो न नीचो यवनात्परः॥ तत्त्वदर्शी मुनियों ने कहा है कि हजारों चांडालों के बराबर एक यवन (म्लेच्छ) होता है। यवन से बढ़कर कोई नीच नहीं है॥5॥ यहां तात्कालिक यवन आक्रमणकारियों से त्रस्त भारत-भूमि की दारुण दशा देखकर ही आचार्य चाणक्य ने यवनों को चांडाल कहा है। यहां यवनों को आप अधर्मी भी कह सकते हैं, जिनकी हिन्दू धर्म में आस्था नहीं है। तैलाभ्यंगे चिताधूमे मैथुने क्षौरकर्मणि। तावद्भवति चांडालो यावत् स्नानं न चाऽऽचरेत॥ (शरीर में) तेल लगाने पर, चिता का धुआं लगने पर, स्त्री-संभोग करने पर, बाल कटवाने पर, मनुष्य तब तक चांडाल, अर्थात अशुद्ध ही रहता है, जब तक वह स्नान नहीं कर लेता॥6॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से सांसारिक रीति-नीति की जानकारी दी है। श्मशान भूमि से चिता का धुआं लगने पर तथा संभोग करने के बाद स्नान की बात तो सभी की जानकारी में है पर तेल मालिश या हजामत बनवाने के बाद स्नान करने का कार्य इतना महत्त्वपूर्ण है यह कम लोग ही जानते हैं। अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम्। भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषं प्रदम्॥ अपच होने पर पानी दवा है, पचने पर बल देने वाला है, भोजन के समय थोड़ा-थोड़ा जल अमृत के समान है और भोजन के अंत में जहर के समान फल देता है॥7॥ 96 सम्पूर्ण चाणक्य नीति—6