सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलिए पराधीन नहीं होता। अतः पत्नी भी यदि साथ छोड़ जाए तो बुढ़ापे के लिए थोड़ा धन बचाकर जरूर रखना चाहिए। नाग्निहोत्रं विना वेदा न च दानं विना क्रिया। न भावेन विना सिद्धिस्तस्माद् भावो हि कारणम्॥ यज्ञ न करने वाले का वेद पढ़ना व्यर्थ है। बिना दान के यज्ञ करना व्यर्थ है। बिना भाव के सिद्धि नहीं होती इसलिए भाव अर्थात प्रेम ही सब में प्रधान है॥10॥ भाव के बिना कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं होता। अतः सभी कार्यों में आस्था जरूरी है। काष्ठपाषाणधातूनां कृत्वा भावेन सेवनम्। श्रद्धया च तयां सिद्धिस्तस्य विष्णोः प्रसीदति॥ लकड़ी, पत्थर और धातु-सोना, चांदी, तांबा, पीतल आदि की बनी देवमूर्ति में देव-भावना अर्थात देवता को साक्षात रूप से विद्यमान समझकर ही श्रद्धासहित उसकी पूजा-अर्चना करनी चाहिए। जो मनुष्य जिस भाव से मूर्ति का पूजन करता है, श्री विष्णुनारायण की कृपा से उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है॥11॥ सच्ची श्रद्धा ही सच्ची पूजा-अर्चना है। मूर्ति चाहे जिस धातु की भी हो, जो मनुष्य जिस भाव से मूर्ति का पूजन करता है, उस पर ईश्वर उतना ही प्रसन्न होता है। शान्तितुल्यं तपो नास्ति न संतोषात् परंसुखम्। न तृष्णायाः परा व्याधिर्न च धर्मो दयापरः॥ शान्ति के बराबर दूसरा तप नहीं है, संतोष से बढ़कर कोई सुख नहीं है, लालच से बड़ा कोई रोग नहीं है और दया से बड़ा कोई धर्म नहीं है॥12॥ 98 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri