सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ अथ पंचम अध्याय ॥ गुरुरग्निर्द्विजातिनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः। पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याऽभ्यागतो गुरुः॥ स्त्रियों का गुरु पति है। अतिथि सबका गुरु है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का गुरु अग्नि है तथा चारों वर्णों का गुरु ब्राह्मण है।।1।। यहां आचार्य चाणक्य ने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया है, परंतु जो ज्ञानी है, वही ब्राह्मण है। कोई जन्म से ही ब्राह्मण नहीं हो जाता। इस श्लोक में 'ब्राह्मण' से चाणक्य का तात्पर्य ज्ञान से परिपूर्ण व्यक्ति से है। यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते, निघर्षणच्छेदनतापताडनैः। तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते, त्यागेन, शीलेन, गुणेन, कर्मणा॥ जिस प्रकार घिसने, काटने, आग में तापने-पीटने, इन चार उपायों से सोने की परख की जाती है, वैसे ही त्याग, शील, गुण और कर्म, इन चारों से मनुष्य की पहचान होती है।।2।। व्यक्तित्व की पहचान, आदमी के शील-स्वभाव, उसके कर्म, उसके गुण और उसकी त्याग-भावना के द्वारा होती है। 62 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri