भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 196 में से

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तावद् भयेषु भेतव्यं यावद् भयमनगतम्। आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशंकया॥ भय से तभी तक डरना चाहिए, जब तक भय आए नहीं। आए हुए भय को देखकर निशंक होकर प्रहार करना चाहिए, अर्थात उस भय की परवाह नहीं करनी चाहिए॥३॥ भयभीत व्यक्ति अपने सारे कार्य भय के वशीभूत होकर बिगाड़ लेता है, लेकिन जो व्यक्ति भय के उपस्थित होने पर उसका विरोध करता है, उसका कार्य कभी खराब नहीं होता। एकोदरसमुद्भूताः एकनक्षत्रजातकाः। न भवन्ति समाः शीले यथा बदरिकंटका॥ एक ही माता के पेट से और एक ही नक्षत्र में जन्म लेने वाली संतान समान गुण और शील वाली नहीं होती, जैसे बेर के कांटे॥4॥ सभी बच्चों का स्वभाव अलग-अलग होता है। भले ही वे जुड़वां पैदा हुए हों। बेर के पेड़ पर फल भी लगता है और कांटे भी। यह ईश्वर की विचित्र लीला है जिसे समझना सरल नहीं। निःस्पृहो नाऽधिकारी स्यान्नाकामी मंडनप्रियः। नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वञ्चकः॥ जिसका जिस वस्तु से लगाव नहीं है, उस वस्तु का वह अधिकारी नहीं है। यदि कोई व्यक्ति सौंदर्य प्रेमी नहीं होगा तो श्रृंगार-शोभा के प्रति उसकी आसक्ति नहीं होगी। मूर्ख व्यक्ति प्रिय और मधुर वचन नहीं बोल पाता और स्पष्ट वक्ता कभी धोखेबाज, धूर्त या मक्कार नहीं होता॥5॥ जो व्यक्ति सहज है, जिसमें किसी के प्रति कोई लगाव या दुराव नहीं है, वह व्यक्ति व्यर्थ की साज-संवार से अपने को अलग 63 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

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