सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २२ ) हिन्दी सांख्य दर्शन इसमें जाति है, यह गुण तथा यह क्रिया इत्यादि । यही विशेष कल्पना और संकल्प है। यही क्रिया जिस में होती है, वह. मन है । (ग) मन की गणना इन्द्रियों में इस लिये है, कि-वह भी अन्य इन्द्रियों के समान सात्विक अहंकार से उत्पन्न हुआ है । एक अहंकार से नाना इन्द्रियों की उत्पत्ति । (घ) गुणों के परिणाम के भेद से एक ही अहंकार से नाना इन्द्रियें हो जाती हैं। जैसे कि- और भी बाह्य वस्तु- रूप रस आदि हो जाती हैं ॥ २७ ॥ दश इन्द्रियों की असाधारणवृत्तियें । शब्दादिषु पञ्चानामालोचनमात्रमिष्यते वृत्तिः । वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाश्च पञ्चानाम् ॥२८॥ श्रोत्र आदि पांच ज्ञानेन्द्रियों की शब्द आदि पांच विषयोंमें आलोचन मात्र (संमुग्धज्ञान = सामान्यज्ञान) वृत्ति मानी जाती है । जैसा कि- मनके लक्षण में समझायागया है । और ५ कर्मेन्द्रियों की क्रम से वचन, आदान, (लेना) वि- हरण, (चलना) उत्सर्ग, (छोड़ना बहाना = निकालना) और आनन्द, ये पांच वृत्तियें हैं ॥ २८ ॥ तीनों अन्तः करणों की वृत्तियें । स्वालक्षण्यं वृत्तिस्त्रयस्य सैषा भवत्यसामान्या । सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्यावायवः पञ्च ॥ २९॥ तीनों अन्तः करणों की वृत्तियें या क्रियाएं अपनें २ लक्षण के रूप से हैं। जैसे—बुद्धि की वृत्तिअध्यवसाय,अहंकार की अभिमान और मनकी संकल्प रूप वृत्ति है । ये इनकी