सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 38, कुल 81 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी सांख्य दर्शन ( २३ ) असाधारण या न्यारी २ वृत्तियें हैं, और ५ प्राण आदि वायु इनकी साधारण ( सामान्या साझे की ) वृत्तियें हैं ॥ ६ ॥ तीनों अन्तः करणों की असाधारण वृत्तियोंमें प्रकार सहित क्रम और अक्रम । युगपच्चतुष्टयस्यतु वृत्तिः क्रमशःश्च तस्यानिर्दिष्टा । दृष्टे तथाऽप्यदृष्टे त्रयस्य तत्पूर्विका वृत्तिः ॥३०॥ उस अन्तःकरणचतुष्टय ( इन्द्रिय सहित मन, केवल मन, अहंकार और बुद्धि ) की वृत्तियें दृष्ट ( प्रत्यक्ष ) विषय में एक साथ और क्रम से ही होती हैं । ऐसे ही अदृष्ट (परोक्ष) विषय में भी बाह्य इन्द्रिय के बिना तीनों अन्तःकरणों ( मन अहँ- कार और बुद्धि ) की वृत्तियें दर्शन पूर्वक एक साथ तथा क्रम पूर्वक होती हैं। यह वाचस्पति मिश्रका मत है। गौडपाद मानते हैं, कि-वर्त्तमान विषय में क्रम से और एक साथ भी चारों की प्रवृत्तियें होती हैं, किन्तु परोक्ष या भूत तथा भविष्यत् विषय में क्रम से ही वृत्तियें होती हैं। यह बात कही गई है कि-बाह्य इन्द्रिय चक्षु आदि से सामान्य ज्ञान होता है, कि-'यह कुछ है, मनसे विशेष ज्ञान होता है' जैसे 'यह घड़ा है' या 'वस्त्र है' इत्यादि, अहंकार से अभिमान होता है, जो एक अपनी योग्यता का ज्ञानस्वरूप है, जैसे कि 'मैं इस वस्तु से ऐसा सम्बन्ध कर सकता हूं' या मैं इस में ऐसी योग्यता रखता हूं, अर्थात्-'मैं इसे उठा सकता हूं, छू सकता हूं, ले सक्ताहूं' इत्यादि और बुद्धि से अध्यव- साय ज्ञान होता है, जिसका स्वरूप यह है, कि-'मैं यह करूं, या 'ऐसा करूं' सुतराम् ज्ञान की चार अवस्थाएं हुईं, किन्तु इनके क्रमके सम्बन्ध में अभी तक कुछ निर्णय नहीं किया गया, उसी के लिये यह कारिका है। इससे यह स्थिर किया