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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

हिन्दी सांख्य दर्शन ( २३ ) असाधारण या न्यारी २ वृत्तियें हैं, और ५ प्राण आदि वायु इनकी साधारण ( सामान्या साझे की ) वृत्तियें हैं ॥ ६ ॥ तीनों अन्तः करणों की असाधारण वृत्तियोंमें प्रकार सहित क्रम और अक्रम । युगपच्चतुष्टयस्यतु वृत्तिः क्रमशःश्च तस्यानिर्दिष्टा । दृष्टे तथाऽप्यदृष्टे त्रयस्य तत्पूर्विका वृत्तिः ॥३०॥ उस अन्तःकरणचतुष्टय ( इन्द्रिय सहित मन, केवल मन, अहंकार और बुद्धि ) की वृत्तियें दृष्ट ( प्रत्यक्ष ) विषय में एक साथ और क्रम से ही होती हैं । ऐसे ही अदृष्ट (परोक्ष) विषय में भी बाह्य इन्द्रिय के बिना तीनों अन्तःकरणों ( मन अहँ- कार और बुद्धि ) की वृत्तियें दर्शन पूर्वक एक साथ तथा क्रम पूर्वक होती हैं। यह वाचस्पति मिश्रका मत है। गौडपाद मानते हैं, कि-वर्त्तमान विषय में क्रम से और एक साथ भी चारों की प्रवृत्तियें होती हैं, किन्तु परोक्ष या भूत तथा भविष्यत् विषय में क्रम से ही वृत्तियें होती हैं। यह बात कही गई है कि-बाह्य इन्द्रिय चक्षु आदि से सामान्य ज्ञान होता है, कि-'यह कुछ है, मनसे विशेष ज्ञान होता है' जैसे 'यह घड़ा है' या 'वस्त्र है' इत्यादि, अहंकार से अभिमान होता है, जो एक अपनी योग्यता का ज्ञानस्वरूप है, जैसे कि 'मैं इस वस्तु से ऐसा सम्बन्ध कर सकता हूं' या मैं इस में ऐसी योग्यता रखता हूं, अर्थात्-'मैं इसे उठा सकता हूं, छू सकता हूं, ले सक्ताहूं' इत्यादि और बुद्धि से अध्यव- साय ज्ञान होता है, जिसका स्वरूप यह है, कि-'मैं यह करूं, या 'ऐसा करूं' सुतराम् ज्ञान की चार अवस्थाएं हुईं, किन्तु इनके क्रमके सम्बन्ध में अभी तक कुछ निर्णय नहीं किया गया, उसी के लिये यह कारिका है। इससे यह स्थिर किया

(२४) हिन्दी सांख्य दर्शन गया है कि-संयोगवंश प्रत्यक्ष विषय में कभी चारों ज्ञान एक साथ होजाते हैं और कभी क्रमसे ही। जैसे-गाढ़ी अँधियारी रात्रि में कोई मनुष्य वन में जाता है, और उसे बिजली के प्रकाश के साथ साम्ने ने कोई व्याघ्र अचानक दिखाई दे, वहां उसे सामान्य, विशेष, अभिमान और अध्यवसाय चारों ज्ञान एक ही साथ हो जाते हैं और वह एक साथ ही पीछे हटता है। ऐसे ही क्रमका उदाहरण मन्द अन्धकारमें लीजिये। पहिले मनुष्य को उसमें 'कुछ है '-ऐसा सामान्य ज्ञान होता है जो नेत्ररूप बाह्यइन्द्रिय का व्यापार है। और फिर टकटकी लगाकर देखने से 'धनुषबाण साधे हुये कोई चोर है, मुझे मा- रना ही चाहता है,-ऐसा प्रतीत होता है, यह विशेष ज्ञान मनका व्यापार है। फिर उसे अभिमान होता है कि-मैं यहां से हट सकता हूं, यह अहंकारका व्यापार है। और फिर इसी प्रकार वह अध्यवसाय करता है कि-मैं यहांसे हटू, यह बुद्धि का व्यापार है ॥ यह प्रत्यक्ष विषय में चारों इन्द्रियोंकी वृत्ति का क्रम और अक्रम हुआ । और जहां बाह्यइन्द्रिय नेत्र आदि का वस्तु से उचित सम्बन्ध नहीं है, अर्थात् जानने योग्य वस्तु भूतकाल में है, या भविष्यत् कालमें है,या अतिदूर आदि होने के कारण वह दुर्ज्ञेय है, वहां तीन अन्तःकरणों (भीतरी- इन्द्रिय मन आदिकों) का ही व्यापार होता है किन्तु नेत्र आदि का नहीं । विशेष यह है कि-जिस विषय पर मन आदिको जाना है वह पहिले बाह्य इन्द्रियसे कभी अनुभव कर लिया गया हो, तभी उस विषय का उन से ज्ञान होता है, अन्यथा नहीं । जैसे किसी ने पहिले राजा का दर्शन किया है, उसी को कालान्तर में उसका मनसे स्मरण होता है। जिसने राजा को देखा नहीं उसे उसका स्मरण भी होता नहीं। इस

हिन्दी सांख्य दर्शन ( २५ ) आभ्यन्तर इन्द्रियों के द्वारा होने वाला ज्ञान बाह्यविषय में स्मरणरूप और आभ्यन्तर सुख दुःख आदि विषय में प्रत्यक्ष रूप होता है ॥ ३० ॥ इन्द्रियों तथा तीनों अन्तःकरणों की परिचालना । यद्यपि इन्द्रियों की प्रवृत्ति का क्रम समझा गया, तथापि यह नहीं जाना गया कि-इनका प्रेरक कौन है या किस से ये परिचालित होती हैं? इसी के उत्तर में यह कारिका है— स्वां स्वां प्रतिपद्यन्ते परस्पराकूतहेतुकां वृत्तिम् । पुरुषार्थ एव हेतु र्न केनचित् कार्यते करणम् ॥ ३१ ॥ जिस प्रकार अनेक चोर आपस में संकेत करके चोरी के स्थान में परस्पर के संकेत वश अपनी२ क्रियाओं को यथाक्रम करते हैं, उसी प्रकार सब इन्द्रियें भी अपनी२ वृत्तियों (क्रिया ओं ) में प्रवृत्त होती हैं, इनकी प्रवृत्तियों में पुरुषार्थ ( पुरुष का अदृष्ट ) ही कारण है । सुतराम् इन्द्रियें किसी चेतन अधि ष्ठाता से परिचालित नहीं होतीं ॥ ३१ ॥ करण के भेद । करणंत्रयोदशविधम्, तदाहरणधारणप्रकाशकरम् । कार्यं च तस्य दशधाऽऽहार्यं धार्यं प्रकाश्यं च ॥३२ करण १३ प्रकार का होता है ( ११ इन्द्रियें १ बुद्धि १ अहंकार ) । उनमें— १-कर्मेन्द्रियों ( वाणी आदिकों ) का आहरण ( लाना ) कर्म है । २-अन्तःकरणों ( बुद्धि अहंकार और मन ) का प्राणादिका अपनी वृत्तियों से धारण करना कर्म है । ३-ज्ञानेन्द्रियों का प्रकाश करना कर्म है ।

( २६ ) हिन्दी सांख्य दर्शन ( क ) कर्मेन्द्रियों का आहार्य ( आहरण करने योग्य ) विषय १० प्रकार का है (१) दिव्य बचन (बोलना ) ( २ ) अदिव्य बचन (३) दिव्य आदान ( लेना ) (४) अदिव्य आदान ( ५ ) दिव्य विहार ( चलना ) ( ६ ) अदिव्य विहार ( ७ ) दिव्य उत्सर्ग (छोड़ना) ( ८) अदिव्य उत्सर्ग (६) दिव्य आनन्द (१०) अदिव्य आनन्द । (ख) तीनों अन्तः करणों का धार्य ( धारण करने योग्य ) विषय १० प्रकार का होता है— (१) दिव्य प्राण ( २ ) अदिव्य प्राण ( ३ ) दिव्य अपान ( ४ ) अदिव्य अपान ( ५ ) दिव्य समान ( ६ ) अदिव्य समान ( ७ ) दिव्य उदान ( ८ ) अदिव्य उदान (•६ ) दिव्य व्यान ( १० ) अदिव्य व्यान । (ग) ज्ञानेन्द्रियों का प्रकाश्य ( प्रकाश करने योग्य ) विषय १० प्रकार का होता है- (१) दिव्य शब्द ( २ ) 'अदिव्य शब्द ( ३ ) दिव्य स्पर्श ( ४ ) अदिव्य स्पर्श ( ५ ) दिव्यरूप ( ६ ) अदिव्य रूप ( ७ ) दिव्य रस ( ८ ) अदिव्य रस ( ६ ) दिव्य गन्ध ( १० ) अदिव्य गन्ध ॥ ३२ ॥ तेरह ( १३ ) प्रकार केकरण । अन्तःकरणंत्रिविधंदशधाबाह्यंत्रयस्यंविषयाख्यम् । साम्प्रतकालंवाह्यंत्रिकालमाभ्यन्तरंकरणम् ॥३३॥ अन्तःकरण तीन प्रकार का होता है बुद्धि, अहंकार, और मन । बाह्य इन्द्रिय दश प्रकार का होता है-५ ज्ञाने- न्द्रियें और ५ कर्मेन्द्रियें । ये दशों बाह्य इन्द्रियें अन्तःकरण के ही विषय को प्रकट

हिन्दी सांख्य दर्शन (२७) करते हैं। अर्थात् जब ये तीनों अन्तःकरण विषय का संकल्प, अभिमान और अध्यवसाय करना चाहते हैं, तब ये १० इन्द्रियें द्वार रूप हो जाती हैं-ज्ञानेन्द्रियें आलोचन (सामा- न्यज्ञान) से और कर्मेन्द्रियें अपनें यथायोग्य व्यापार से द्वार भूत होती हैं। विशेषान्तर- बाह्य इन्द्रियों का सामर्थ्य केवल वर्त्तमान विषय में रहता है, और बुद्धि आदि आभ्यन्तर करणों का सामर्थ्य भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान तीनों कालों में होता है ॥३३॥ बाह्य इन्द्रियों के विषय। बुद्धीन्द्रियाणितेषां पञ्चविशेषाविशेषविषयाणि । वाग्भवतिशब्दविषया शेषाणितुपञ्चविषयाणि ।३४। उन १० बाह्य इन्द्रियों में ५ ज्ञानेन्द्रियों के विशेष (स्थूल शब्द आदि और पृथिवी आदि जो शान्त, घोर तथा मूढ स्वभाव हैं) और अविशेष (तन्मात्र-सूक्ष्म शब्द आदि) विषय हैं। इस में भी यह विशेष है, कि यागियों का श्रोत्र (कान) सूक्ष्म शब्द और स्थूल (मोटा) शब्द दोनों को सुन सकता है, किन्तु हम लोगों का कान केवल मोटे शब्द को ही सुन सकता है। उन की त्वक् (चर्म) मोटे और सूक्ष्म दोनों प्रकार के स्पर्श को ग्रहण कर सकती है और हमारी त्वक (चर्म) मोटे ही स्पर्श को छू सकती है। एवम् उन के और हमारे नेत्र आदि में भी भेद है। अर्थात् उन के नेत्र आदि स्थूल व सूक्ष्म दोनों प्रकार के रूप आदि को ग्रहण कर सकते हैं और हमारे केवल स्थूल ही विषय को ले सकते हैं। ऐसे ही कर्मेन्द्रियों में वाक् (वाणी) हमारी या योगि- यों की हो, स्थल शब्द को ही उच्चारण कर सकती है, किन्तु

( २८ ) हिन्दी सांख्य दर्शन सूक्ष्म शब्द को नहीं। क्योंकि वाक् इन्द्रिय और सूक्ष्म शब्द दोनों अहंकार रूप एक ही कारण से उत्पन्न हुये हैं। अर्थात् एक साथ उत्पन्न होने वाला बराबर वाले को अनुभव नहीं कर सकता। और शेष चार (गुदा, लिङ्ग या योनि, हाथ, और पैर ) इन्द्रियों के रूप आदि ५ विषय हैं क्यों कि हस्त आदि चार इन्द्रियें जिन घट आदि वस्तुओं से सम्बन्ध करते हैं, वे सब शब्द आदि तन्मात्ररूप ही हैं, या उन्हीं से प्रकट हुये हैं। गौडपाद आचार्य यहां कहते हैं कि मनुष्यों की ज्ञा- नेन्द्रियें सुख, दुःख और मोह रूप विषयों से युक्त शब्द आदिकों को प्रकाशित करती हैं और देवताओं की ज्ञानेन्द्रियें शब्द आदि को प्रत्यक्ष करती हैं, किन्तु उन्हें उन में सुख दुःख आदि की प्रतीति नहीं होती। कर्मेन्द्रियों में वाणी दोनों की बराबर है। ( हमारी समझ में देवताओं की वाणी जैसे शुद्ध शब्द को उच्चारण कर सकती है, वैसे मनुष्यों की नहीं) और शेष इन्द्रियें (हाथ आदि) ५ विषयों को ग्रहण करती हैं। अर्थात् हाथ में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध पांचों विषय हैं, इसी से वह उक्त पांचों गुण वाली पृथ्वी में चलता है। ऐसे गुद आदि में भी योजना करना ॥ हमारी समझ में दोनों व्याख्यानों का समुच्चय (मेल) हो सकता है। अर्थात् हमारी देवताओं तथा योगियों की इन्द्रियों की शक्ति में दोनों ही प्रकार से भेद का संभव है, अतः दोनों ही व्याख्यान स्वीकार करने योग्य हैं ॥ ३४ ॥ करणों की परस्पर गौणता और प्रधानता सान्तःकरणाबुद्धिःसर्व विषयमवगाहतेयस्मात् । तस्मात्तत्रिविधंकरणंद्वारि, द्वाराणिशेषाणि ॥३५॥

हिन्दी सांख्यदर्शन (२६) अन्य दो अन्तःकरणों (मन, अहंकार) सहित बुद्धि अर्थात् तीनों अन्तःकरण जिससे कि-भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान काल में शब्द आदि सब विषयों को अवगाहन (ग्रहण) करते हैं, इससे उक्त तीनों अन्तःकरण द्वारि (प्रधान) और शेष बाह्य इन्द्रियें द्वार (अप्रधान या गौण) हैं ॥ ३५ ॥ मन और अहंकार दोनों की अपेक्षा बुद्धि की प्रधानता एते प्रदीपकल्पाः परस्परविलक्षणा गुणविशेषाः । कृत्स्नं पुरुषस्यार्थ प्रकाश्य बुद्धौ प्रयच्छन्ति ॥३६॥ ये सब बुद्धि के अतिरिक्त जितने करण हैं, अर्थात्-५ ज्ञा- नेन्द्रियें ५ कर्मेन्द्रियें, अहंकार और मन (कुल १२) सब दीपक के समान हैं। अपनें २ विषय को प्रकाश करने वाले हैं। आपस में सब विलक्षण हैं, भिन्न २ विषय वाले हैं। और गुण विशेष हैं, सत्व आदि गुणों से उत्पन्न हुये २ हैं। पुरुष को जो २ कुछ विषय अपनें में भान होता हुआ प्रतीत होता है, उस सब को ये करण (इन्द्रियें) अपनें २ विषय के अनु- सार प्रकाशित करके बुद्धि में स्थापित करते हैं। प्रयोजन यह है कि-जो विषय बाहरी इन्द्रियों में भासता है, वही भीतरी इन्द्रिय मन में विशेष रूप से पड़ता है, फिर वही अहंकार- में पहुंचता है, जिसका कि-उसे अभिमान होता है, और वही विषय उस के द्वारा बुद्धि में चमकता है, जिसका कि-उसे अध्यवसाय (निश्चय) होता है। बस इससे आगे वह विषय कहीं नहीं जाता, अतः इनमें सर्व प्रधान बुद्धि ही है। इनके मत में इन्द्रिय आदि संघात का अध्यक्ष बुद्धि तत्व ही है। नैया यिकों के समान आत्मा अध्यक्ष नहीं है। अर्थात् उनके मतमें सब पदार्थों का ज्ञान साक्षात् सम्बन्ध से आत्मा में ही उत्प- न्न होता है, इन्द्रियें उसी के साधन हैं अतः वही अध्यक्ष

( ३० ) हिन्दीसांख्यदर्शन ( प्रधान ) है । इनके मत में सब ज्ञान बुद्धि में ही रहता है, आत्मा या पुरुष में उसकी छायामात्र पड़ती है और साक्षात् सम्बन्ध का ज्ञान भ्रान्ति रूप है । अतः बुद्धि ही प्रधान है ३६ फिर बुद्धि की प्रधानता । सर्वं प्रत्युपभोगं यस्मात् पुरुषस्य साधयति बुद्धिः । सैव च विशिनष्टि पुनः प्रधानपुरुषान्तरं सूक्ष्मम्३७ जिस कारण से कि-पुरुष के सब विषय के उपभोग को बुद्धि साधन करती है, और वही फिर प्रधान और पुरुष के सूक्ष्म (दुर्लक्ष्य) अन्तर को प्रकाशित करती है, अतः वही (बुद्धि) प्रधान है। जिस प्रकार कि-सर्वाध्यक्ष या प्रधान मन्त्री राजा के सब कार्यों का साक्षात् सम्पादन करने से प्रधान है, और ग्रामाध्यक्ष आदि उसके प्रति गौण रहते हैं। अर्थात्- बुद्धि पुरुष के साक्षात् सम्बन्ध से या ठीक उसी के साथ संयुक्त होने से पुरुष की छाया ( छवि ) को धारण कर लेती है, जो २ कुछ सुख, दुःख आदि बुद्धिमें होता है वही पुरुषमें दिखाई देता है, और सब पुरुष से दूर रहते हैं, जैसे अहंकार और पुरुष के बीच में बुद्धि पड़ जाती है, तथा और इन्द्रियों के बीच में अहंकार और बुद्धि पड़ती है । इसी से उनपर पुरुष की और पुरुष पर उनकी छाया नहीं पड़ती । सुतराम् उक्त प्रकार बुद्धि ही पुरुष के सब उपभोगों का साक्षात् साधन है, और वही प्रधान ॥ ३७ ॥ विशेष अविशेषों का विभाग । तन्मात्राण्यविशेषाः, तेभ्यो भूतानि पञ्चपञ्चभ्यः एतेस्मृता विशेषाः, शान्ता घोराश्चमूढाश्च ॥३८॥ शब्द आदि ५ तन्मात्र अविशेष कहलाते हैं, और उन

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ३१ ) शब्द आदि पांच तन्मात्रों से आकाश आदि ५ महाभूत होते हैं। ये ५ महाभूत विशेष कहलाते हैं। क्योंकि-ये कोई शान्त कोई घोर, और कोई मूढ़ होते हैं। अर्थात्-सूक्ष्म शब्द आदि तन्मात्र उपभोग योग्य नहीं होते हैं, इसी से उनके शान्तत्व आदि धर्मों का अस्मदादिकों को अनुभव नहीं होता, अतएव ये ‘अविशेष’ पद के वाच्य होते हैं। और आकाश आदि ५ भूत स्थूल होने से उनके शान्तत्व आदि धर्मों को हम अनुभव करते हैं, इसी से वे विशेष कहे जाते हैं ॥ ३ ॥ विशेषों के अवान्तर विशेष । सूक्ष्मा मातापितृजाः सहप्रभूतैस्त्रिधा विशेषाः स्युः । सूक्ष्मांस्तेषां नियता मातापितृजानिवर्त्तन्ते ॥३९॥ प्रकृति से उत्पन्न होने वाले २४ तत्वों में से अनेक २ तत्वों के मेल से तीन विशेष वस्तुएं होती हैं, जिन से पुरुष का उपभोग सिद्ध होता है। जैसे १ सूक्ष्म शरीर जो १८ तत्वों से संग्रह किया हुआ होता है, २ रा माता पिता से उत्पन्न होने वाला स्थूल शरीर और ३ रा विशेष महाभूत हैं । इन्हीं तीन विभागों में बटे हुये सब प्राकृत पदार्थों का पुरुष उपभोग करता है। इनमें सूक्ष्म शरीर की स्थिति तत्वज्ञान के उत्पन्न होने तक रहती है, और माता पिता से होने वाले नष्ट हो जाते हैं, तथा उसके तत्व अपनें २ समान तत्व में मरण के अनन्तर मिल जाते हैं। इसी प्रकार महाभूत भी प्रलय काल में अपनें २ अव्यक्त कारण में मिल ही जाते हैं ॥ ३६ ॥ सूक्ष्म शरीर का निरूपण । पूर्वोत्पन्नमसक्तं नियतं महदादि सूक्ष्मपर्यन्तम्। संसरति निरुपभोगं भावैरधिवासितं लिङ्गम् ॥४०॥

( ३२ ) हिन्दी सांख्य दर्शन लिङ्ग शरीर सृष्टि के आदि काल में प्रधान से प्रतिपुरुष अलग २ उत्पन्न किया गया है । असक्त है, अर्थात्-शिलामें भी प्रवेश कर जाता है । नियत या महाप्रलय तक ठहरने वाला है १-महत्तत्व १-अहंकार १-मन ५-ज्ञानेन्द्रियें ५-कर्मेन्द्रियें और ५ तन्मात्र कुल १८ तत्वों का समूहरूप है । षाट्कौशिक ( ६ कोशों के समूहरूप ) स्थूल शरीरके बिना अकेला भोगका स्थान नहीं बन सकता, और धर्म अधर्म आदि ८ भावों की वासना से युक्त होनेके कारण संसरण करता है ( पूर्व २ शरीरको छोड़र कर नये २ शरीरकी धारण करता है) ॥ ४० ॥ लिङ्ग शरीर को स्थूल शरीर की अपेक्षा । चित्रंयथाश्रयमृते स्थाण्वादिभ्योविनायथाच्छाया। तद्वद् विना विशेषैर्न तिष्ठति निराश्रयं लिङ्गम् ॥४१॥ जिस प्रकार आश्रय (दीवार आदि) के बिना और छाया वृक्ष आदि के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार स्थूल शरीर के विना लिङ्ग शरीर नहीं रहता ( यहां तक कि-मृत्युके पश्चात् दूसरे शरीर के ग्रहण करने से पहिले उस अवान्तर में भी तात्कालिक अदृष्टनिर्मित एक पाञ्चभौतिक शरीर उसे मिल जाता है सर्वथा वह निराश्रय नहीं रहता) ॥४१॥ लिङ्ग शरीर की संसृति का प्रकार और कारण । पुरुषार्थहेतुकमिदं निमित्तनैमित्तिकप्रसंगेन । प्रकृतेर्विभुत्वयोगान्नटवद्व्यवतिष्ठतेलिङ्गम् ॥४२॥ पुरुषार्थ (जीवों के अदृष्ट) की प्रेरणा से युक्त होकर यह लिङ्ग शरीर धर्म, अधर्म और षाट्कौशिक शरीर के सम्बन्धसे नटके समान नानारूप ( मनुष्यदेव तिर्यक्रूप) से व्यव- स्थित होता है । प्रकृतिके विभुत्व (महिमा) से उसे विलक्ष-

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ३३ ) कार शरीरों की दुर्लभता नहीं है ॥४२॥ निमित्त और नैमित्तिक का विभाग । सांसिद्धिकाश्चभावाःप्राकृतिकावैकृताश्चधर्माद्या । दृष्टाःकरणाश्रयिणः कार्याश्रयिणश्चकललाद्याः॥४३॥ धर्म आदि भाव दो प्रकार के होते हैं, प्राकृतिक और वैकृतिक । प्राकृतिक सांसिद्धिक या स्वाभाविक कहे जाते हैं जैसे-सृष्टिके आदि कालमें भगवान् कपिलदेव महामुनि जन्म से ही धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य युक्त प्रकट हुये । इन में धर्म आदि जो भाव थे वे स्वाभाविक थे । और जो किसी देवता के आराधन आदि उपाय से उत्पन्न होते हैं, वे वैकृ- तिक असांसिद्धिक या अस्वाभाविक कहे जाते हैं । जैसे-प्राचेतस आदि महर्षियोंको धर्म आदिकी प्राप्तिहुई । ये भाव करणों में या इन्द्रियसम्मूहरूप लिङ्ग शरीर में रहते हैं ॥ षाट्कौशिक शरीर की गर्भ में कलल, बुद्बुद, मांस-पेशी, अङ्ग प्रत्यङ्ग व्यूह आदि अवस्थायें होतीहैं । तथा गर्भसे बाहर निकले हुये स्थल शरीर की बाल्य, कौमार, यौवन और बुढापा अवस्थाएं होती हैं । ( भावोंका विभाग निमित्त विभाग है और शरीरों का विभाग नैमित्तिक विभाग है ) गौड़पाद यहां भावों के तीन भेद मानते हैं-सांसिद्धिक, प्राकृत, और वैकृत । इनके उदाहरण में आदि विद्वान् कपिल सनकादि और अस्मदादि हैं इस मतमें सांसिद्धिक स्वाभाविक प्राकृत देवता के आराधन आदि उपाय से उत्पन्न और वैकृत अध्ययन से उत्पन्न हैं ॥४३॥ किस निमित्त का कौन नैमित्तिक है । धर्मेणगमनमूर्ध्वंगमनमधस्ताद्भवत्यधर्मेण ।

( ३४ ) हिन्दी सांख्य दर्शन ज्ञानेनचापवर्गो विपर्ययादिष्यतेबन्धः ॥४४॥ धर्म से ऊर्ध्वगमन ( स्वर्ग आदि की प्राप्ति ) अधर्म से अधोगति ( नरक आदि दुःख की प्राप्ति ) ज्ञान से अपवर्ग ( मोक्ष ) और अज्ञान से बन्धन ( संसार ) माना . गया है ॥ ४४ ॥ वैराग्यात्प्रकृतिलयःसंसारो भवति राजसाद्रागात्। ऐश्वर्यादविघातो विपर्ययात्तद्विपर्यासः ॥४५॥ जिनको आत्मज्ञान नहीं हुआ और उन्हें पहिले ही इस लोक तथा परलोक के सुख में वितृष्णा ( अनिच्छा ) हो गई तथा वे प्रकृति या उसके कार्य महत्तत्त्व आदि में ही आत्म बुद्धि करके उनकी उपासना करते हैं, उनका उनकी उपासना के अनुसार प्रकृति आदिमें लय हो जाता है और फिर संसार में आगमन होजाता है राजस राग से संसार होता है। ऐश्वर्य से इच्छा का अविघात होता है, अर्थात् जिस वस्तु की इच्छा करता है उसे वही मिल जाती है । एवम् अनैश्वर्य से इच्छा का विघात होता है, जिस वस्तु की इच्छा करता है वह उसे नहीं मिलती ॥ ४५ ॥ फल सहित आठ भाव । ( का० ४४-४५ ) निमित्त नैमित्तिक निमित्त नैमित्तिक १ धर्म से ऊर्ध्वगमन ५ वैराग्यसे प्रकृतिलय । २ अधर्म से अधोगति । ६ अवैराग्य से संसार ३ ज्ञान से मोक्ष ७ ऐश्वर्य से इच्छानभि ४ अज्ञान से बन्धन । घात

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ३५ ) निमित्त नैमित्तिक अनैश्वर्य से सर्वत्र इच्छा का विघात बन्ध चित्र का० ४४-४५

बन्धअधिकारीफलकालव्यवस्था
प्राकृतॐ प्रकृति का उपासकप्रकृतिलयएककल्पॐ प्रकृति को आत्म बुद्धि से उपासना करने वाला
वैइन्द्रिय में आत्मबुद्धि से चिन्तन करने वालाविगतज्वरतादश मन्वन्तर
काबुद्धिको आत्मबुद्धि से उपासना करनेवालाबुद्धिमेंलय१० सहस्र
रिअहंकार को आत्मबुद्धि से उपासना करने वालाअहंकार में लय१ सहस्र
पृथिवीआदि भूतोंमें आत्मबुद्धि सेउपासकभूतलय१००
दाक्षिणिकइष्टापूर्तकारी (यज्ञानुष्ठानकारी)स्वर्गविधि कहा गयाकाल
(८)ईश्वरापर्ण बुद्धि से इष्टापूर्तकारीक्रममुक्तिक्रम यह है कि- पहिले निष्काम कर्म, फिर उससे अन्तःकरणशुद्धि, फिर तत्त्वज्ञान, फिर मोक्ष ।

( ३६ ) हिन्दी सांख्य दर्शन बुद्धि का संक्षिप्त सर्ग । एषप्रत्ययसर्गोविपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्ध्याख्यः । गुणवैषम्यविमर्दात्तस्यचभेदास्तुपंचाशत् ॥४६॥ विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि, और सिद्धि-यह बुद्धि का संक्षिप्त सर्ग ( सृष्टि ) है । गुणों के न्यून अधिक होने से जो उन का आपस में विमर्द्द होता है, या आपस में एक को दूसरा दबा कर प्रधान हो जाता है, उससे उसके ५० भेद होते हैं ॥ ४६ ॥ संक्षिप्त सर्ग—चित्र ( का० ४६ ) कारण कार्य बुद्धि ( १ ) विपर्यय ( २ ) अशक्ति ( ३ ) तुष्टि ( ४ ) सिद्धि । अन्तर्भाव चित्र ( का० ४६ ) जिसमें अन्तर्भाव जिसका अन्तर्भाव (१) विपर्यय (१) अज्ञान । (२) अशक्ति (२) अनैश्वर्य (३) अवैराग्य (४) अधर्म । (३) तुष्टि (५) धर्म (६) वैराग्य (७) ऐश्वर्य । (४) सिद्धि (८) ज्ञान । संक्षिप्त सर्ग के ५० भेदों की गणना । पञ्चविपर्ययभेदा भवन्त्यशक्तिश्च करणवैकल्यात् । अष्टाविंशतिभेदा, तुष्टिर्नवधा,ऽष्टधासिद्धिः ॥४७॥ विपर्यय के ५ भेद होते हैं, अशक्ति,-बुद्धि आदि १३ करणों के वैकल्य ( विकल हो जाने ) से २८ प्रकार की, तुष्टि ९ प्रकार की और सिद्धि ८ प्रकार की होती है । इन सब का योग करने से ५० भेद होते हैं ॥

हिन्दी सांख्यदर्शन ( ३७ ) ५० भेदों के नाम । ( विपर्यय के भेदों के नाम ) ( १ ) विपर्यय- ( १ ) अविद्या ( तमः ) ( २ ) अस्मिता ( मोह ) ( ३ ) राग ( महामोह ) ( ४ ) द्वेष ( तामिस्र ) ( ५ ) अभिनिवेश ( अन्धतामिस्र ) ॥ ७७ । विपर्यय के भेदों के भेद । भेदस्तमसोऽष्टविधो मोहस्य च दशविधोमहामोहः । तामिस्रोऽष्टादशधा तथाभवत्यन्धतामिस्रः ॥ ४८ ॥ तम या अविद्या के ८ भेद हैं । मोह ( अस्मिता ) के ८ हैं । महामोह ( राग ) के १० भेद हैं । तामिस्र (द्वेष) के १८ भेद हैं । अन्धतामिस्र ( अभिनिवेश ) के १८ भेद हैं । कुल ६२ भेद हैं ) ॥ व्याख्या । ( १ ) तम या अविद्या अव्यक्त, महत्तत्व, अहंकार और शब्द आदि ५ तन्मात्रों में आत्म-बुद्धिरूप ८ प्रकार की होती है । ( २ ) अस्मिता या मोह । देवताओंको ८ प्रकार के ऐश्वर्य की प्राप्तिसे "यह अणिमा आदि हमारा शाश्वतिक (सदाका) ऐश्वर्य है" ऐसा अभिमान होता है, तद्रूप अस्मिता ८ प्रकार की होती है । ( ३ ) राग या महामोह-दिव्य अदिव्य शब्द आदि दशविध रञ्जनीय ( जिन में राग हो ) विषयों में आसक्तिरूप दश प्रकार का महामोह होता है । ( ४ ) द्वेष ( तामिस्र ) दिव्य अदिव्य भेद से १० प्रकार के शब्द आदि विषय परस्पर से उपघात किये जाते हुये द्वेष के विषय होते हैं और अणिमा आदि ८ सिद्धियें

( ३८ ) हिन्दी सांख्य दर्शन स्वरूप से ही कोपनीय होती हैं, अतः १० शब्द आदि और ८ अणिमा आदि मिलकर १८ क्रोध के विषय होने से क्रोध या द्वेष १८ प्रकार का होता है । ( ५ ) अभिनिवेश (अन्धतामिस्र) । अणिमा आदि ८ ऐश्वर्य और शब्द आदि १०, कुल १८ विषयों या उपायों को प्राप्त होकर देवताओं को भय होता है, कि-इन्हें असुर न छीन लें। इस प्रकार भयका विषय १८ प्रकारका होनेसे भय या अन्धतामिस्र भी १८ प्रकार का होता है ॥४८॥ २८ प्रकार की अशक्ति । ( ११ इन्द्रिय बध, ६ अतुष्टियें और ८ असिद्धियें ) एकादशेन्द्रियबधाः सहबुद्धिबधैरशक्तिरुद्दिष्टा । सप्तदशबधा बुद्धे र्विपर्ययात्तुष्टिसिद्धीनाम् ॥४९॥ १७ बुद्धि बधों के सहित ११ इन्द्रियों के बधरूप २८ प्रकार की अतुष्टि कही गई है । तुष्टियों और सिद्धियोंके वि- परीत रूप सेअर्थात्-६ अतुष्टियों और ८असिद्धियों के रूप से बुद्धि-बध १७ होते हैं ॥ ४६ ॥ नवधा ( ६ ) तुष्टि । आध्यात्मिक्यश्चतस्रःप्रकृत्युपादानकालभाग्याख्याः बाह्याविषयोपरमात्पञ्च, नवतुष्टयोऽभिमताः ।५०। चार अध्यात्मिकी (भीतरी) तुष्टियें होती हैं। जिनके प्रकृति उपादानकाल और भाग्य ये नाम हैं'विषयों से उपरति ( निवृत्ति) के कारण बाह्य ( बांहरी ) तुष्टियें ५ होती हैं । सब मिलकर ६ तुष्टियें हैं । व्याख्या । 'प्रकृति से आत्मा भिन्न वस्तु है'-ऐसा निश्चय करके फिर इसके श्रवण, मनन और निदिध्यासन के द्वारा विवेक साक्षा-

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ३६ ) त्कार के लिये असत् उपदेश से सन्तुष्ट होकर जो पुरुष यत्न • नहीं करता, उसको ये चार आध्यात्मिक्री तुष्टियें होती हैं । क्योंकि-ये तुष्टियें प्रकृति से भिन्न आत्मा को लेकर होती हैं इसी से ये आध्यात्मिक्री हैं। इन की विशेष व्याख्या इस प्रकार है कि- (क) किसी ने किसी को उपदेश दिया कि- विवेक साक्षा- त्कार ( प्रकृति और आत्माके भेद को अपने अनुभवमें लाना ) प्रकृति का ही परिणाम विशेष है, अतः उसे प्रकृति स्वयम् ही करदेगी इससे तुझे ध्यान का अभ्यास नहीं करना चाहिये हे वत्स ! तू इसी प्रकार रह । सो यह उस शिष्यको जो प्राकृ- ती (प्रकृति पर निर्भरता ) तुष्टि होती है उसका नाम 'प्रकृति' ( अम्भः ) ही है । (ख) [ दूसरा उपदेश ] यद्यपि वह विवेकख्याति प्रकृति से होती है, तथापि केवल प्रकृति से ही नहीं । क्योंकि-यदि प्रकृति से ही विवेक-ख्याति या तत्वज्ञान हो तो उस को सब के प्रति समान होनेके कारण सबको सब कालमें विवेकख्याति होना चाहिये? इस कारण हे वत्स ! तू संन्यास धारण कर । संन्यास से तुझे वह ख्याति प्राप्त होगी। इस उपदेश से जो शिष्य को तुष्टि होती है, वह उपादान ( सलिल ) कह- लाती है । (ग) [ तीसरा उपदेश ] यद्यपि संन्याससे निर्वाण (मुक्ति) होती है, किन्तु तत्काल नहीं, अर्थात् वही संन्यास तुझे काल पाकर सिद्धि देगा, अतः तू उतावला मत हो, इस उपदेश से जो काल में तुष्टि होती है वह काल कहलाती है, दूसरा नाम इसका मेघ है । • (घ) [ चौथा उपदेश ] विवेक-ख्याति को न काल कर

सकता है, और न उपादान ही, किन्तु वह भाग्य से ही होती

( ४० ) हिन्दी सांख्य दर्शन सकता है, और न उपादान ही, किन्तु वह भाग्य से ही होती है इसीसे मदालसा के पुत्र अति बालक होने पर भी माता के उपदेश मात्र से ही विवेक-ख्यातिको प्राप्त हुये और मुक्त भी। उस में भाग्य ही कारण था, किन्तु और कुछ नहीं। इस उप- देश से जो भाग्य में तुष्टि है वह भाग्य (वृष्टि) कहलाती है। जो तुष्टियें प्रकृति, महत्‌तत्व, अहंकार आदि अनात्म वस्तुओं को आत्मा समझ कर वैराग्य से होजाती हैं, वे सब बाह्य तुष्टियें हैं। क्योंकि-आत्म-ज्ञान के न होने की अवस्था ही में वे अनात्म ( बाह्य ) वस्तु के अवलम्बन से होती हैं। इन तुष्टियों का कारण वैराग्य है, और वह वैराग्य ५ कारणों से होता है, अतः वह पांच प्रकार का समझा जाता है; तथा उसके कारण ही उस से होने वाली तुष्टियें भी ५ ही मानी जाती हैं। अर्थात्-भोग्य विषय शब्द आदि ५ हैं, और उनके उपरम (वैराग्य) भी ५ हैं। विषय की संख्या के समान इस के कारण भी (१) अर्जन (२) रक्षण (३) क्षय (४) भोग (५) हिंसा, ये पांच हैं, इससे भी वैराग्य या उपरम ५ हैं। इनकी विशेष व्याख्या इस प्रकार है— (क) [ अर्जन ] धनके अर्जन या संग्रह करनेके उपाय सेवा आदि हैं, जो सेवक आदि को दुःखित करने वाले हैं। क्यों कि-सेवा में क्रोधी स्वामी से कभी २ थप्पड़ या गर्दना आदि भी खाना पड़ता है। सुतराम् इन दुःखों को अनुभव करने वाले बुद्धिमान् उसमें प्रवृत्त नहीं होते। इसी प्रकार अन्य उपायों में भी दोष हैं, इस प्रकार जो विषयसे उपरम तुष्टि है वह 'पार' कहलाती है। (ख) [ रक्षण ] धन किसी प्रकार इकट्ठा हो भी गया, तो उसके राजा, चोर, अग्नि जलप्रवाह आदि से नांश होजाने की

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ४१) संभावना है, अतः उसकी रक्षा में महादुःख है, ऐसी भावना वाले को जो विषय से उपरम में तुष्टि है, वह दूसरी 'सुपार' 'तुष्टि है। (ग) [क्षय] ऐसे ही बड़े परिश्रम से इकट्ठा किया हुआ धन भोग करने से क्षीण होजाता है, इस प्रकार उसके क्षय हो जाने की भावना करने वाले को जो विषय के उपरम में तुष्टि होती है, वह तीसरी 'पारापार' कहलाती है। (घ) इसी प्रकार शब्द आदि विषयों के भोगाभ्यास से काम (मनोरथ) बढ़ते हैं, और वे विषय की प्राप्ति न होने पर कामी पुरुषको दुःखित करते हैं इससे भोग दोषको जानने वालेको जो विषयसे उपरम में तुष्टि होती है, वह चौथी 'अनु- त्तमाम्भ' कहलाती है। (ङ) ऐसे ही दसरे प्राणियों की हानि किये बिना या सताये बिना विषयों का उपभोग नहीं हो सकता, इस हिंसा दोष को देख कर जो विषय से उपरम में तुष्टि होती है, वह ५ वीं 'उत्तमाम्भ' कहलाती है। ऐसे चार आध्यात्मिकौ और ५ बाह्य तुष्टियों को मिलाकर ६ तुष्टियें होती हैं ॥ ५० ॥ गौण और मुख्य सिद्धियें ॥ ऊहः शब्दोऽध्ययनं दुःखविघातास्त्रयः सुहृत्प्राप्तिः । दानंचसिद्धयोऽष्टौसिद्धेपूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविधः ॥५१॥ तीन दुःखों के नाश तीन मुख्य सिद्धियें हैं। और सब (१) अध्ययन (२) शब्द (३) ऊह (४) सुहृत्प्राप्ति और (५) दान ये ५ सिद्धियें गौण हैं। सिद्धिके पूर्व जो विपर्यय अशक्ति और तुष्टि के भेद से तीन प्रकार की बुद्धि की सृष्टि (का० ४६ में) देखी गई है,

दित) (विवेकज्ञान की शुद्धि)

( ४० ) हिन्दीसांख्यदर्शन उसको अंकुश संज्ञा है। क्योंकि वह सिद्धि को रोकती है। गौणसिद्धियें-(१) अध्ययन (तार) (२) शब्द (सुतार) (शब्दसे अर्थ का ज्ञान) (३) ऊह (तर्क) (तारतार) (४) सुहृत्प्राप्ति (मित्र मिलन) (रम्यक) और (५) दान (मुदामु- दित) (विवेकज्ञान की शुद्धि) मुख्यसिद्धियें-(१) आध्यात्मिक दुःख का नाश (प्रमोद) (२) आधिभौतिक दुःख का नाश (मुदित) और (३) आधि- दैविक दुःख का नाश (मोदमान) (कुल ८ सिद्धियें)॥५१॥ प्रकारान्तर से सिद्धियें । (१) ऊह--जिस में पूर्व जन्म के अभ्यास से आप से आप तत्व ज्ञान हो जावे। (२) शब्द-जिस में दूसरे के सांख्य शास्त्रीय अध्ययन को सुन कर तत्वों का ज्ञान उत्पन्न हो। (३) अध्ययन-जिस में गुरु और शिष्य के सम्बन्ध से संवाद पूर्वक ग्रन्थ और अर्थ दोनों प्रकार से सांख्य शास्त्र को अध्ययन करने से ज्ञान उत्पन्न हो। (४) सुहृत्प्राप्ति--जिस में तत्वों के ज्ञाता मित्र की प्राप्ति से ज्ञान उत्पन्न हो। (५) दान-जिस में धन के दान से सन्तुष्ट हो कर गुरु ज्ञान देवे, वह सिद्धि धन दान के कारण होने से 'दान' कहलाती है॥ ५१॥ प्रत्यय (बुद्धि) और तन्मात्र या भूत सर्ग का प्रयोजन नविनाभावैर्लिङ्गं नविनालिङ्गेन भावनिर्वृत्तिः । लिङ्गाख्योभावाख्यस्तस्माद्द्विविधःप्रवर्त्ततेसर्गः।५२। बुद्धि तत्व से दो प्रकार की सृष्टि होती है, एक सृष्टि भाव-सृष्टि है और दूसरी लिङ्ग-सृष्टि है। पहिली भावसृष्टि