सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २८ ) हिन्दी सांख्य दर्शन सूक्ष्म शब्द को नहीं। क्योंकि वाक् इन्द्रिय और सूक्ष्म शब्द दोनों अहंकार रूप एक ही कारण से उत्पन्न हुये हैं। अर्थात् एक साथ उत्पन्न होने वाला बराबर वाले को अनुभव नहीं कर सकता। और शेष चार (गुदा, लिङ्ग या योनि, हाथ, और पैर ) इन्द्रियों के रूप आदि ५ विषय हैं क्यों कि हस्त आदि चार इन्द्रियें जिन घट आदि वस्तुओं से सम्बन्ध करते हैं, वे सब शब्द आदि तन्मात्ररूप ही हैं, या उन्हीं से प्रकट हुये हैं। गौडपाद आचार्य यहां कहते हैं कि मनुष्यों की ज्ञा- नेन्द्रियें सुख, दुःख और मोह रूप विषयों से युक्त शब्द आदिकों को प्रकाशित करती हैं और देवताओं की ज्ञानेन्द्रियें शब्द आदि को प्रत्यक्ष करती हैं, किन्तु उन्हें उन में सुख दुःख आदि की प्रतीति नहीं होती। कर्मेन्द्रियों में वाणी दोनों की बराबर है। ( हमारी समझ में देवताओं की वाणी जैसे शुद्ध शब्द को उच्चारण कर सकती है, वैसे मनुष्यों की नहीं) और शेष इन्द्रियें (हाथ आदि) ५ विषयों को ग्रहण करती हैं। अर्थात् हाथ में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध पांचों विषय हैं, इसी से वह उक्त पांचों गुण वाली पृथ्वी में चलता है। ऐसे गुद आदि में भी योजना करना ॥ हमारी समझ में दोनों व्याख्यानों का समुच्चय (मेल) हो सकता है। अर्थात् हमारी देवताओं तथा योगियों की इन्द्रियों की शक्ति में दोनों ही प्रकार से भेद का संभव है, अतः दोनों ही व्याख्यान स्वीकार करने योग्य हैं ॥ ३४ ॥ करणों की परस्पर गौणता और प्रधानता सान्तःकरणाबुद्धिःसर्व विषयमवगाहतेयस्मात् । तस्मात्तत्रिविधंकरणंद्वारि, द्वाराणिशेषाणि ॥३५॥