भारतकोश
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 81 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 42

हिन्दी सांख्य दर्शन (२७) करते हैं। अर्थात् जब ये तीनों अन्तःकरण विषय का संकल्प, अभिमान और अध्यवसाय करना चाहते हैं, तब ये १० इन्द्रियें द्वार रूप हो जाती हैं-ज्ञानेन्द्रियें आलोचन (सामा- न्यज्ञान) से और कर्मेन्द्रियें अपनें यथायोग्य व्यापार से द्वार भूत होती हैं। विशेषान्तर- बाह्य इन्द्रियों का सामर्थ्य केवल वर्त्तमान विषय में रहता है, और बुद्धि आदि आभ्यन्तर करणों का सामर्थ्य भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान तीनों कालों में होता है ॥३३॥ बाह्य इन्द्रियों के विषय। बुद्धीन्द्रियाणितेषां पञ्चविशेषाविशेषविषयाणि । वाग्भवतिशब्दविषया शेषाणितुपञ्चविषयाणि ।३४। उन १० बाह्य इन्द्रियों में ५ ज्ञानेन्द्रियों के विशेष (स्थूल शब्द आदि और पृथिवी आदि जो शान्त, घोर तथा मूढ स्वभाव हैं) और अविशेष (तन्मात्र-सूक्ष्म शब्द आदि) विषय हैं। इस में भी यह विशेष है, कि यागियों का श्रोत्र (कान) सूक्ष्म शब्द और स्थूल (मोटा) शब्द दोनों को सुन सकता है, किन्तु हम लोगों का कान केवल मोटे शब्द को ही सुन सकता है। उन की त्वक् (चर्म) मोटे और सूक्ष्म दोनों प्रकार के स्पर्श को ग्रहण कर सकती है और हमारी त्वक (चर्म) मोटे ही स्पर्श को छू सकती है। एवम् उन के और हमारे नेत्र आदि में भी भेद है। अर्थात् उन के नेत्र आदि स्थूल व सूक्ष्म दोनों प्रकार के रूप आदि को ग्रहण कर सकते हैं और हमारे केवल स्थूल ही विषय को ले सकते हैं। ऐसे ही कर्मेन्द्रियों में वाक् (वाणी) हमारी या योगि- यों की हो, स्थल शब्द को ही उच्चारण कर सकती है, किन्तु

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 42, कुल 81 में से · BharatKosha