सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३६ ) हिन्दी सांख्य दर्शन बुद्धि का संक्षिप्त सर्ग । एषप्रत्ययसर्गोविपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्ध्याख्यः । गुणवैषम्यविमर्दात्तस्यचभेदास्तुपंचाशत् ॥४६॥ विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि, और सिद्धि-यह बुद्धि का संक्षिप्त सर्ग ( सृष्टि ) है । गुणों के न्यून अधिक होने से जो उन का आपस में विमर्द्द होता है, या आपस में एक को दूसरा दबा कर प्रधान हो जाता है, उससे उसके ५० भेद होते हैं ॥ ४६ ॥ संक्षिप्त सर्ग—चित्र ( का० ४६ ) कारण कार्य बुद्धि ( १ ) विपर्यय ( २ ) अशक्ति ( ३ ) तुष्टि ( ४ ) सिद्धि । अन्तर्भाव चित्र ( का० ४६ ) जिसमें अन्तर्भाव जिसका अन्तर्भाव (१) विपर्यय (१) अज्ञान । (२) अशक्ति (२) अनैश्वर्य (३) अवैराग्य (४) अधर्म । (३) तुष्टि (५) धर्म (६) वैराग्य (७) ऐश्वर्य । (४) सिद्धि (८) ज्ञान । संक्षिप्त सर्ग के ५० भेदों की गणना । पञ्चविपर्ययभेदा भवन्त्यशक्तिश्च करणवैकल्यात् । अष्टाविंशतिभेदा, तुष्टिर्नवधा,ऽष्टधासिद्धिः ॥४७॥ विपर्यय के ५ भेद होते हैं, अशक्ति,-बुद्धि आदि १३ करणों के वैकल्य ( विकल हो जाने ) से २८ प्रकार की, तुष्टि ९ प्रकार की और सिद्धि ८ प्रकार की होती है । इन सब का योग करने से ५० भेद होते हैं ॥