भारतकोश
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

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( ४४ ) हिन्दी सांख्य दर्शन ( ग ) मनुष्य-सर्ग १ प्रकार का है । यहसंक्षेप से १४ प्रकार का भूतसर्ग है ॥ ५३ ॥ तीन प्रकार से भूत सर्ग ऊर्ध्वंसत्वविशालस्तमोविशालश्चमूलतःसर्गः । मध्येरजोविशालो, ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तः ॥५४॥ पहिला ऊर्ध्व सर्ग है, जिस में सत्वगुण की प्रधानता रहती है, एवम् उसकी परिस्थिति द्य लोक से सत्यलोक पर्यन्त है । २रा सर्ग मूलसर्ग या जीव की नीच गति का सर्ग है । इस में तमोगुण की प्रधानता है, इसी से यह मोहमय होता है, इस की गणना पशु से वृक्ष पर्यन्त है । और तीसरा मध्य ( बीच ) का सर्ग है, इस में रजोगुण की प्रधानता है, अतएव यह दुःख बहुल है, इस की गणना में सम्पूर्ण भूलोक है, जिस में सातों द्वीप और सातों समुद्र आजाते हैं ॥५४ ॥ सर्ग ( सृष्टि ) की दुःख रूपता । तत्रजरामरणकृतं दुःखम्प्राप्नोतिचेतनःपुरुषः । लिङ्गस्याविनिवृत्तेस्तस्माद्दुःखंस्वभावेन ॥५५॥ उस पूर्वोक्त सृष्टि में सब स्थानों में जरा ( बुढापा ) और मरण के दुःख को चेतन पुरुष, लिङ्ग शरीर की निवृत्ति से पहिले प्राप्त होता रहता है । इस से संसार में दुःख स्वाभा- विक है । यद्यपि भिन्न २ शरीरों में भिन्न २ प्रकार का सुख भोग भी है, तथापि जरा मरण का दुःख सर्वत्र समान है । जो बुद्धि के ( प्राकृत ) गुण हैं, वे सब लिङ्ग शरीर में रहते हैं, और लिङ्ग शरीर पुरुष का सम्बन्धी है । क्योंकि पुर ( लिङ्ग ) में शयन करने से ही वह पुरुष है । अतः लिङ्ग