भारतकोश
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

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हिन्दी सांख्य दर्शन ( ४५ ) के द्वारा अध्यासवश पुरुष में भी दुःखों का सम्बन्ध हो जाता है ॥ ५५ ॥ निःसन्देह उक्त सब सर्ग प्रकृति से ही हुआ है । इत्येषप्रकृतिकृतो महदादिविशेषभूतपर्यन्तः । प्रतिपुरुषविमोक्षार्थं स्वार्थइवपरार्थआरम्भः ॥५६॥ ( क ) यह सब महत् तत्व आदि विशेष ( स्थूल ) भूत पर्यन्त जितना सर्ग है, वह सब प्रकृति का किया हुआ है। क्योंकि- ( १ ) सर्ग को अकारण मानने में सर्ग का अत्यन्त भाव ( होता ही रहे कभी रुके नहीं ) अथवा अत्यन्त अभाव ही हो ( कभी सृष्टि हो ही नहीं ) । ( २ ) ब्रह्म से भी सृष्टि नहीं। क्योंकि-चिति शक्ति में परिणाम का अभाव है । ( ३ ) ईश्वर से अधिष्ठित प्रकृति से भी सृष्टि नहीं । क्योंकि-निर्व्यापार ( व्यापार रहित ) ईश्वर का अधिष्ठातृत्व हो नहीं सकता, अर्थात् - जब वह कुछ करता ही नहीं, तो वह अधिष्ठाता कैसे हो सकता या अधिष्ठाता उसे मान भी लिया जावे तो उससे क्या लाभ ? क्योंकि जैसे-क्रियाशून्य खाती की कुल्हाड़ी कुछ नहीं कर सकती । ( ख ) प्रकृति का जो महत् तत्व ( बुद्धि ) आदि २३ तत्वों के रूप में आरम्भ या कार्य है, वही प्रत्येक पुरुष को क्रम प्राप्त ( संयोगवश ) मोक्ष का भी कारण हो जाता है । उस का आरम्भ ऐसा है, जैसा-कोई स्वार्थ के समान अपने मित्र के कार्य को बिना अपने प्रयोजन के ही करे । हमें इसमें यह प्रतीति होती है, कि-इनके मतमें ईश्वर नहीं और न पुरुष में कोई क्रिया और ज्ञान आदि गुण ही है, जो कुछ है, वह

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