भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १०५ ) इसी तरह प्रकृति भी अपने आप सृष्टि करती है, पुरुष के भय प्रेरणादिक की अपेक्षा नहीं करती । कर्माकृष्टेर्वाऽनादितः ॥६२॥ अर्थ—अथवा कर्मों के अनादि प्रवाह के वश होकर प्रकृति सृष्टि को करती है । अब इससे आगे सृष्टि की निवृत्ति के कारणों को कहेंगे— विविक्तबोधात् सृष्टिनिवृत्तिः प्रधानस्य सूदवत् पाके ॥६३॥ अर्थ—जब विविक्त बोध अर्थात् एकान्त ज्ञान हो जाता है, तब प्रकृति की सृष्टि निवृत्त हो जाती है, जैसे—रसोइया भोजन बनाकर निश्चिन्त हो जाता है, फिर उसको कोई काम विशेष नहीं रहता । इसी तरह प्रकृति भी विवेक ( ज्ञान ) को उत्पन्न करके अपनी सृष्टि को निवृत्त कर देती है । आशय यह है कि ज्ञान होने से संसार छूट जाता है । प्र०—जबकि एक को ज्ञान हुआ और उससे सृष्टि की निवृत्ति हो गई, तो फिर विशेष जीव बद्ध क्यों रहते हैं ? क्योंकि सृष्टि की निवृत्ति में बन्धन न रहना चाहिये । उ०—इतर इतरवत्तद्दोषात् ॥ ६४ ॥ अर्थ—जो विवेक ( ज्ञान ) रहित है, वह बद्ध के बराबर है, क्योंकि अज्ञान के दोष से बँधा रहना ही पड़ता है। अब सृष्टि निवृत्ति का फल कहते हैं— द्वयोरेकतरस्य वोदासीन्यमपवर्गः ॥ ६५ ॥ अर्थ—प्रकृति और पुरुष इन दोनों की आपस में उदासीनता का होना ही मुक्ति कहलाता है । दूसरा यह भी अर्थ हो सकता