सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १०८ ) मनोरथ पूरे हो जाते हैं, तब वह नाच करने से निवृत्त हो जाती है; इसी तरह यद्यपि प्रकृति का सृष्टि करना स्वभाव है, परन्तु उस सृष्टि करने का जो प्रयोजन है वह विवेक के उत्पन्न होने से निवृत्त होजाता है, अतएव उससे निवृत्त भी होजाती है। अब मुक्ति से पुनरागमन होता है या नहीं, इसपर यहां इस कारण विचार किया जाता है, कि इस ऊपर के सूत्र में विवेक के उपरान्त सृष्टि की निवृत्ति प्रतिपादन कर चुके, और इस पर यह सन्देह होता है, कि जब प्रकृति यह समझ लेती होगी, कि पुरुष को मेरे संयोग से अनेक दुःखादि होते हैं, अत- एव फिर उसका संयोग किसी काल में न कहना चाहिये। इसी मत पर तो आचार्य विचार करते हैं। दोषबोधेऽपि नोपसर्पणं प्रधानस्य कुल- वधूवत् ॥ ७० ॥ अर्थ—पुरुष को मेरे संयोग से दुःख होगा, इस बात में प्रकृति अपना दोष जानती है, तो क्या फिर उसका संयोग नहीं करती, किन्तु अवश्य करती है, जैसे—अच्छे वंश की पतिव्रता स्त्री से यदि कोई दोष हो भी जाय, और उससे स्वामी को कष्ट भी पहुँचे, तब क्या वह अपने पति के पास का जाना छोड़ देगी ? ऐसा नहीं होसकता, अवश्य जायगी; क्योंकि जो पति को त्यागती है, तो उसका पतिव्रत धर्म नष्ट होता है। और भी प्रकार से अन्य आचार्यों ने इस सूत्र का अर्थ किया है, कि जब प्रकृति अपना दोष जान लेती है तब लज्जा के वश होकर फिर कभी पुरुष के पास नहीं जाती, जैसे कुलवधू नहीं जाती। इस अर्थ के करने से उनका तात्पर्य यह है, कि मुक्ति से पुनरावृत्ति नहीं होती, परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं; क्योंकि विज्ञानभिक्षु ने "अपि" शब्द का कुछ भी आशय नहीं निकाला, और न यह समझा