सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १०७ ) के वास्ते प्रकृति सृष्टि की निवृत्ति और किसी के वास्ते प्रवृत्ति हो इसमें क्या नियम है ? उ०—कर्म का प्रवाह ही इसमें नियम है । प्र०—यह उत्तर ठीक नहीं, क्योंकि न मालूम किस मनुष्य का कौन-सा कर्म है ? यह भी कोई निश्चय किया हुआ नियम नहीं है ? उ०—नैरपेक्ष्येऽपि प्रकृत्युपकारेऽविवेको निमित्तम् ॥ ६८ ॥ अर्थ—यद्यपि सब पुरुष निरपेक्ष हैं, अर्थात् एक दूसरे की अपेक्षा नहीं रखता, तथापि यह मेरा स्वामी है, मैं इसका सेवक हूँ ; इस तरह प्रकृति के उपकार में ( सृष्टि करने में ) अविवेक ही निमित्त है । प्रत्यक्ष यह है कि जब प्रकृति यह बात चाहती है, कि यह मनुष्य मुक्त हो, तब ही उसको अपनी सृष्टि के भीतर रखकर अनेक प्रकार के कार्यों में लगा देती है, और उन्हीं कार्यों को करता हुआ वह मनुष्य किसी न किसी जन्म में विवेकी ( ज्ञानी ) होकर मुक्त हो जाता है; इसी वास्ते आचार्य ने सूत्र में उपकार शब्द को स्थापित किया है । प्र०—जबकि प्रकृति का स्वभाव वर्त्तमान मान लिया है, तो ज्ञान के उत्पन्न होने पर क्यों निवृत्त हो जाती है ? क्योंकि जो जिसका स्वाभाविक धर्म है, वह सब जगह एकसा रहना चाहिए ? उ०—नर्त्तकीवत् प्रवृत्तस्यापि निवृत्तिश्चा- रितार्थ्यात् ॥ ६९ ॥ अर्थ—जैसे नाच करनेवाली का नाच करना स्वभाव है, वह सब सभा को नाच दिखाती है, और जब नाच करते करते उसके