भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ११४ ) वृद्ध मन्त्री बोला—हे वत्स ( पुत्र ) तू शवर नहीं है, किन्तु राजपुत्र है, ऐसे वाक्यों को सुनकर वह राजपुत्र शीघ्र ही उस शवरभाव के मान को त्यागकर सात्विक राजभाव को धारण करने लगा, कि मैं तो राजा हूँ। इस प्रकार चिरबद्ध जीव भी अपने को बद्ध मानता है, और जब तत्त्वोपदेश से उसको ईश्वर विषयक ज्ञान होता है, तब विवेकोत्पत्ति से उसको मुक्ति प्राप्त होती है। इस सूत्र के अर्थ से कोई-कोई टीकाकार “ब्रह्मास्मि” वाला सिद्धान्त निकालते हैं, कि जीव पहिले ब्रह्म था, इस कारण मुक्त था, किन्तु अज्ञान से बंध गया है, जब तत्त्वोपदेश हुआ तो विवेक होने से मुक्ति हो गई। लेकिन ऐसा मानना ठीक नहीं है, क्योंकि पहिले तो ग्रन्थ के आरम्भ में इस बात का खण्डन किया है ; दूसरे सूत्र में जो राजपुत्र ऐसा शब्द कहा है, उससे प्रत्यक्ष मालूम होता है कि आचार्य जीव और ब्रह्म में भेद मानते हैं, इस वास्ते जीव को छोटा मान कर राज पुत्रवत् ऐसा कहा है, नहीं तो राजवत् ऐसा ही कह देते, किन्तु दो अक्षरों का अधिक कहना इसी आशय से है, कि कोई एक ब्रह्म के रूपान्तर का अर्थ न समझ ले । पिशाचवदन्यार्थोपदेशेऽपि ॥ २ ॥ अर्थ—एक के वास्ते जो उपदेश किया जाता है, उससे दूसरा भी मुक्त हो जाता है, जैसे—एक समय श्रीकृष्णजी अर्जुन को उपदेश कर रहे थे, लेकिन एक पिशाच भी सुन रहा था, वह पिशाच उस उपदेश को सुनकर उसके अनुष्ठान द्वारा मुक्ति को प्राप्त हो गया । आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ॥ ३ ॥ अर्थ—यदि एक बार के उपदेश से विवेक-प्राप्ति न हो, तो फिर उपदेश करना चाहिये, क्योंकि छान्दोग्य उपनिषद् में लिखा