सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 116, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें( ११५ ) है कि श्वेतकेतु के वास्ते आरुणि आदि मुनियों ने बारबार उपदेश किया था। पितापुत्रवदुभयोर् दृष्टत्वात् ॥ ४ ॥ अर्थ—विवेक के द्वारा प्रकृति और पुरुष दोनों ही दीखते हैं। दृष्टान्त—कोई मनुष्य अपनी गर्भिणी स्त्री को छोड़कर परदेश गया था, जब वह आया देखता क्या है, कि पुत्र उत्पन्न होकर पूरा युवा हो गया, लेकिन न तो वह पुत्र जानता है, कि यही मेरा पिता है, और न वह पुरुष जानता है, कि यही मेरा पुत्र है, तब उस स्त्री ने दोनों को प्रबोध ( ज्ञान ) कराया, कि यह तेरा पिता है, तू इसका पुत्र है। इसी तरह विवेक भी प्रकृति और पुरुष का जानने वाला है। श्येनवत् सुखदुःखी त्यागवियोगाभ्याम् ॥ ५ ॥ अर्थ—संसार का यह नियम है कि जब-जब द्रव्य-प्राप्ति होती है, तब-तब तो आनन्द, और जब वह द्रव्य चला जाता है तब ही दुःख होता है। दृष्टान्त—कोई श्येन ( बाज़ ) किसी पक्षी का मांस लिये चला जाता था, उसी समय किसी व्याध ने पकड़ लिया और उससे वह मांस छीन लिया, तो वह अत्यन्त दुःखी होने लगा। यदि आप ही उस मांस को त्याग देता तो क्यों दुःख भोगता ? इस कारण आप ही विषय-वासना इत्यादि का त्याग कर देना चाहिये। अहिनिर्ल्वयिनीवत् ॥ ६ ॥ अर्थ—जैसे साँप पुरानी केंचली को छोड़ देता है, इसी तरह मुमुक्षु ( मोक्ष की इच्छा करने वाले ) को विषय त्याग देने चाहिये। छिन्नहस्तवद्वा ॥ ७ ॥