भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ११६ ) अर्थ—जैसे किसी मनुष्य का हाथ कटकर गिर पड़ता है, फिर वह कटे हुए हाथ से किसी तरह का संबंध नहीं रखता, इसी तरह विवेक प्राप्त होने पर जब विषय-वासना नष्ट हो जाता है, तब मुमुक्षु फिर उन विषय-वासनाओं से कुछ संबंध नहीं रखता है। असाधनानुचिन्तनं बन्धाय भरतवत् ॥ ७ ॥ अर्थ—जो मोक्ष का साधन नहीं है लेकिन धर्म में गिनकर साधन वर्णन कर दिया तो उसका जो विचार है, वह केवल बंधन का ही कारण होगा, न कि मोक्ष का । दृष्टांत—जैसे राजर्षि भरत यद्यपि मोक्ष की इच्छा करने वाले थे, लेकिन किसी ने कोई अनाथ हरिण का बच्चा महात्मा को पालने के लिये दे दिया, और उस अनाथ हरिण के बच्चे के पालन-पोषण में महात्मा के विवेक-प्राप्ति का समय नष्ट हो गया, और मुक्ति न हुई । यद्यपि अनाथ का पालन राजा का धर्म था, तथापि पालन के विचार में महात्मा से विवेक साधन न हो सका, इस वास्ते बंध का हेतु हो गया । इसी वास्ते कहते हैं कि धर्म कोई और वस्तु है, और विवेक साधन कुछ और वस्तु है । बहुभिर्योगे विरोधो रागादिभिःकुमारीशंखवत्।६ अर्थ---विवेक-साधन समय बहुतों का संग न करे, किन्तु अकेले ही विवेक-साधन को करे ; क्योंकि बहुतों के साथ में राग-द्वेषादि की प्राप्ति होती है, उससे साधन में विघ्न होने का भय प्राप्त हो जाता है । दृष्टान्त—जैसे कि कोई कुमारी ( कन्या ) हाथों में चूड़ियाँ पहन रही थी, जब दूसरी कन्या के साथ उस- का मेल हुआ, तब आपस में धक्का लगकर चूड़ियों का झनकार शब्द हुआ, इसी तरह यहाँ भी विचारना चाहिये, कि बहुतों के संग में विवेक साधन नहीं हो सकता ।