सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ११७ ) द्वाभ्यामपि तथैव ॥ १० ॥ अर्थ—दो के साथ भी विवेक साधन नहीं हो सकता, क्योंकि दो आदमियों में भी राग-द्वेषादि का होना सम्भव है। निराशः सुखी पिंगलावत् ॥ ११ ॥ अर्थ—जो मनुष्य आशा को त्याग देता है, वह सदैव पिंगला नाम वेश्या के समान सुख को प्राप्त होता है। दृष्टांत— पिंगला नाम वाली एक वेश्या थी, उसको जार मनुष्यों के आने का समय देखते-देखते बहुत रात बीत गई, लेकिन कोई विषयी उसके पास न आया, तब वह जाकर सो रही, बाद को फिर उस वेश्या को ख्याल हुआ शायद अब कोई आदमी आव, ऐसा विचार कर वह वेश्या फिर उठ आई, और बहुत समय तक फिर जागती रही, लेकिन फिर भी कोई न आया, तब उस वेश्या ने अपने चित्त में बड़ी ग्लानि मानी और कहा कि “आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्” आशा बड़े दुःख देती है, और नैराश्य में बड़ाभारी सुख है, ऐसा विचार कर उस वेश्या ने उस दिन से आशा त्याग दी और परम सुख को प्राप्त हुई। इसी तरह जो मनुष्य आशा को त्यागेंगे वह परम सुख को प्राप्त होंगे। अनारम्भेऽपि परगृहे सुखीसर्पवत् ॥ १२ ॥ अर्थ—गृहादिकों के विना बनाये भी पराये घर में सुख पूर्वक रह सकता है, जैसे—साँप पराये घर में सुख-पूर्वक वास करता है। बहुशास्त्रगुरुपासनेऽपि सारादानं षट्पदवत् ॥ १३ अर्थ-बहुत से शास्त्रों से और गुरुओं से सार वस्तु जो विवेक