सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ११८ ) का साधन है उस ही को लेना चाहिये, जैसे—भौंरा फूलों का जो सार मद है उसको ग्रहण करता है ; इसी तरह सार का लेना योग्य है । इषुकारवन्नैकचित्तस्य समाधि हानिः ॥ १४ ॥ अर्थ—जिसका मन एकाग्र रहता है, उसकी समाधि में किसी समय किसी प्रकार की भी हानि नहीं हो सकती । दृष्टांत— कोई बाण बनानेवाला अपने स्थल पर बैठा हुआ बाण बना रहा था, उसी समय उसकी बगल से होकर कटक सहित राजा निकल गया ; लेकिन उसको न मालूम हुआ कौन चला गया, और उसके काम में भी किसी प्रकार की बाधा न हुई ; क्योंकि उसका मन अपने काम में आसक्त था । कृतनियमलङ्घनादानर्थक्यं लोकवत् ॥ १५ ॥ अर्थ—शौच, आचार आदि जो नियम विवेक की वृद्धि के वास्ते माने गये हैं, उनके लंघन से अर्थात् ठीक तौर से न पालने पर अनर्थ होता है, और उन नियमों का -फिर कुछ भी फल नहीं होता, जैसे कि रोगी के वास्ते वैद्य ने पथ्य बताया वास्ते नफे के, लेकिन उसने कुछ पथ्य न किया, उसको कुछ फल अच्छा न होगा, किन्तु रोग वृद्धि को ही प्राप्त होगा । तद्विस्मरणेऽपि भेकीवत् ॥ १६ ॥ अर्थ—तत्वज्ञान के भूलने से दुःख प्राप्त होता है । दृष्टांत— कोई राजा शिकार खेलने के वास्ते वन को गया था, वहाँ पर उस राजा ने दिव्यस्वरूप एक कन्या को देखा, और उस कन्या को देखकर राजा मोहित हो गया, और बोला, कन्ये ! तुम कौन हो ? वह बोली राजन् ! मैं भेकराज ( मेढकों के राजा ) की कन्या हूँ । तब राजा अपनी स्त्री होने के वास्ते उससे प्रार्थना