भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ११६ ) करने लगा, तब वह कन्या बोलो, राजन् ! अगर मुझको जल का दर्शन हो जायगा, तब ही मैं तेरा साथ छोड़ दूँगी ; इसवास्ते मुझको जल का दर्शन न होना चाहिये, यह मेरा नियम पालन करना होगा । राजा ने प्रसन्न होकर इस बात को स्वीकार कर लिया । एक समय वह दोनों आनन्द में आसक्त थे, तब वह कन्या राजा से बोलो कहाँ जल है, तब राजा ने उस बात को भूल कर उसको जल दिखा दिया । जल के दर्शन समय ही वह कन्या उस रूप को छोड़कर जल में प्रवेश कर गई । तब राजा ने दुःखी होकर उस कन्या को जल के अन्दर बहुत देखा, लेकिन वह फिर न प्राप्त हुई, जैसे—यह राजा उस तत्त्व बात को भूल कर दुःख को प्राप्त हुये, इसी तरह मनुष्य भी तत्त्वज्ञान के भूलने से दुःख को प्राप्त होता है । नोपदेशश्रवणेऽपि कृतकृत्यता परामर्शादृते विरोचनवत् ॥ १७ ॥ अर्थ—उपदेश के सुनने ही मात्र से कृतकृत्यता नहीं होती जब तक कि उसका विचार न किया जाय । दृष्टान्त—बृहस्पति- जी ने विरोचन और इन्द्र इन दोनों को सत्योपदेश किया था । इन्द्र ने उस उपदेश को सुनकर विचारा भी, परन्तु विरोचन ने न विचारा, किन्तु कान ही पवित्र किये । दृष्टस्तयोरिन्द्रस्य ॥ १८ ॥ अर्थ—देखने में आया है, कि उस श्रवण से इन्द्र को ही विवेक ज्ञान हुआ, विरोचन को नहीं ; क्योंकि इन्द्र ने तो उस उपदेश का विचार किया था । प्रणतिब्रह्मचर्योपसर्पणानि कृत्वा सिद्धिर्बहु- कालात् तद्वत् ॥ १९ ॥