भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १२० ) अर्थ—गुरु से नम्र रहना, सदा गुरु की सेवा करना, ब्रह्म- चर्य को धारण करना, और वेद पढ़ने के वास्ते गुरु के पास जाना, इन्हीं कर्मों के करने से विवेक की सिद्धि हो जाती है, से कि इन्द्र को हुई थी। न कालनियमो वामदेववत् ॥ २० ॥ अर्थ—इतने दिनों में विवेक उत्पन्न होगा, ऐसा कोई नियम नहीं है; क्योंकि वामदेव नाम वाले ऋषि को पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण थोड़े ही दिनों में विवेक उत्पन्न हो गया था। अध्यस्तरूपोपासनात् पारम्पर्येण यज्ञोपास- कानामिव ॥ २१ ॥ अर्थ—शरीर ही आत्मा है, वा मन ही आत्मा है, इस प्रकार अध्याहार करके जो उपासना की जाती है, उसके परंपरा संबंध से विवेक होता है, जैसे—पहिले पुत्र को आत्मा माना, पीछे शरीर को, उसके पश्चात् इन्द्रियों को, इसी प्रकार करते-करते आत्म-विवेक हो जाता है जैसे—यज्ञ करने वालों की परम्परा संबन्ध से मुक्ति होती है; क्योंकि यज्ञ करने से चित्त की शुद्धि होती है, और चित्त शुद्धि से वासनाओं की न्यूनता आदि परम्परा से मुक्ति होती है, इसी प्रकार अध्यस्त उपासना से भी जानना चाहिये । इतरलाभेऽप्यावृत्तिः पंचाग्नियोगतो जन्म- श्रुतेः ॥ २२ ॥ अर्थ—यदि पञ्चाग्नि योग से इतर अर्थात् शान्ति का लाभ भी कर लिया, तो भी कर्मों की वासना बलवती बनी रहेगी; अतएव वह कर्म फिर भी उत्तरोत्तर उत्पन्न होते जायेंगे, इसी