भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 192 में से

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( १२२ ) अर्थ—जब काम जारी रहेगा, तब उसके गुणों में किसी की प्रीति हो जायगी, तो भी उस विवेकी को फिर बद्ध होना पड़ेगा, जैसे—मनोहर भाषण ( बोलना ) आदि गुणों से तोते का बन्धन हो जाता है। न भोगाद्रागशान्तिर्मु'निवत् ॥ २७ ॥ अर्थ—भोगों को पूर्णरूप से भोगने से भी राग की शान्ति नहीं होती, जैसे—सौभरि नाम वाले मुनि ने भोगों को खूब अच्छी तरह भोगा, लेकिन उससे कुछ भी शान्ति न हुई। मृत्यु के समय उन महात्मा ने ऐसा कहा भी था कि— आमृत्युतो नैवमनोरथानामन्तोऽस्ति विज्ञातमिदं मयाद्य। मनोरथासक्तिपरस्यचित्तं न जायते वै परमार्थसङ्गि ॥ अर्थ—आज मुझको इस बात का पूरा-पूरा निश्चय हो गया, कि मृत्यु तक मनोरथों का अन्त नहीं है, और जो चित्त मनोरथों में लगा हुआ है, उसमें विज्ञान का उदय कभी नहीं होता। दोषदर्शनादुभयोः ॥ २८ ॥ अर्थ—प्रकृति और प्रकृति के कार्यों के दोष, इन दोनों के देखने से रागों की शान्ति होती है, और जिसका चित्त राग-द्वेष इत्यादिकों से युक्त है, उसको उपदेश फल का देने वाला नहीं होता। न मलिनचेतस्युपदेशबीजप्ररोहोऽजवत् ॥ २६ ॥ अर्थ—रागादिकों से मलिन चित्त में उपदेश रूप ज्ञान वृक्ष का बीज नहीं जमता। राजा अज के समान, राजा अज की इन्दु- मती स्त्री थी, उस स्त्री से राजा का बड़ाभारी प्रेम था। काल- वश होकर वह इन्दुमती मृत्यु को प्राप्त हो गई। राजा अज उस- के वियोग से बड़ाभारी दुःखी हुआ। उसका हृदय स्त्री के वियोग

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