सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १२३ ) से परम मलीन हो गया था। वशिष्ठजी ने उपदेश भी किया, लेकिन वियोग-मलिन हृदय में उपदेश का अंकुर न जमा। नाभासमात्रमपि मलिन दर्पणवत् ॥ ३० ॥ अर्थ—मलिन हृदय में उपदेश का आभास-मात्र भी नहीं पड़ता, जैसे—मैले शीशे में प्रतिबिम्ब ( अक्स ) नहीं दीखता। न तज्जस्यापि तद्रू पम् पङ्कजवत् ॥ ३१ ॥ अर्थ—मोक्ष भी प्रकृति के ही सहारे से होता है, परन्तु जैसे प्रकृति से संसार उत्पन्न हुआ है, और वह उसी प्रकृति का रूप समझा जाता है, वैसे मोक्ष प्रकृति का रूप नहीं हो सकता ; क्योंकि जैसे पंक ( कीच ) से उत्पन्न हुआ, कमल कीच के रूप का नहीं होता, वैसे प्रकृति से उत्पन्न हुआ मोक्ष प्रकृति रूप नहीं हो सकता है। न भूतियोगेऽपि कृतकृत्यतोपास्यसिद्धिवदु- पास्य सिद्धिवत् ॥ ३२ ॥ अर्थ—ऊहादि विभूतियों के मिलने पर भी कृत-कृत्यता नहीं होती ; क्योंकि जैसा उपास्य ( जिसकी उपासना की जाती है ) होगा वैसी ही उपासक को सिद्धि प्राप्त होगी, अर्थात् जो धनवान् की उपासना की जाती है, तो धन मिलता है, और दरिद्र की उपासना करने से कुछ भी नहीं मिलता। इसी प्रकार ऊहा आदि सिद्धियाँ नाश होनेवाली हैं, इस वास्ते उनकी प्राप्ति से कृतकृत्यता नहीं हो सकती । सिद्धिवत्, सिद्धिवत्, ऐसा जो दुबारा कहना है, सो अध्याय की समाप्ति का जतानेवाला है । इति सांख्यदर्शने चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः