भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

( १२३ ) से परम मलीन हो गया था। वशिष्ठजी ने उपदेश भी किया, लेकिन वियोग-मलिन हृदय में उपदेश का अंकुर न जमा। नाभासमात्रमपि मलिन दर्पणवत् ॥ ३० ॥ अर्थ—मलिन हृदय में उपदेश का आभास-मात्र भी नहीं पड़ता, जैसे—मैले शीशे में प्रतिबिम्ब ( अक्स ) नहीं दीखता। न तज्जस्यापि तद्रू पम् पङ्कजवत् ॥ ३१ ॥ अर्थ—मोक्ष भी प्रकृति के ही सहारे से होता है, परन्तु जैसे प्रकृति से संसार उत्पन्न हुआ है, और वह उसी प्रकृति का रूप समझा जाता है, वैसे मोक्ष प्रकृति का रूप नहीं हो सकता ; क्योंकि जैसे पंक ( कीच ) से उत्पन्न हुआ, कमल कीच के रूप का नहीं होता, वैसे प्रकृति से उत्पन्न हुआ मोक्ष प्रकृति रूप नहीं हो सकता है। न भूतियोगेऽपि कृतकृत्यतोपास्यसिद्धिवदु- पास्य सिद्धिवत् ॥ ३२ ॥ अर्थ—ऊहादि विभूतियों के मिलने पर भी कृत-कृत्यता नहीं होती ; क्योंकि जैसा उपास्य ( जिसकी उपासना की जाती है ) होगा वैसी ही उपासक को सिद्धि प्राप्त होगी, अर्थात् जो धनवान् की उपासना की जाती है, तो धन मिलता है, और दरिद्र की उपासना करने से कुछ भी नहीं मिलता। इसी प्रकार ऊहा आदि सिद्धियाँ नाश होनेवाली हैं, इस वास्ते उनकी प्राप्ति से कृतकृत्यता नहीं हो सकती । सिद्धिवत्, सिद्धिवत्, ऐसा जो दुबारा कहना है, सो अध्याय की समाप्ति का जतानेवाला है । इति सांख्यदर्शने चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः

( १२४ ) पंचमोऽध्यायः महाप कापिलजी ने अपने शास्त्र का सिद्धांत मुक्ति के साधनों के सम्बन्ध में पहिले चार अध्यायों में विस्तारपूर्वक वर्णन किया, अब इस अध्याय में वादी प्रतिवादी रूप से जो शास्त्र में सूक्ष्मतापूर्वक कही हुई बातें हैं, उनका प्रकाश करेंगे । कोई वादी शंका करता है, कि मंगलाचरण करना व्यर्थ है, इस विषय को हेतु गर्भित वाक्यों से प्रतिपादन करते हैं । मंगलाचरणं शिष्टाचारात् फलदर्शनात् श्रुतितश्चेति ॥ १ ॥ अर्थ—मंगलाचरण करना अवश्य चाहिये ; क्योंकि शिष्टजनों का यही आचार है, और प्रत्यक्ष में भी यही फल दीखता है। जो उत्तम आचरण करता है, वही सुख भोगता है । अहरहः संध्यामुपासीत, अहरहोऽग्निहोत्रं जुहुयात् । रोज-रोज संध्या करनी चाहिये, रोज-रोज अग्निहोत्र करना चाहिये, इत्यादि श्रुतियाँ भी अच्छे ही आचरणों को कहती हैं । बहुतेरे मनुष्य मंगलाचरण का यह अर्थ समझते हैं, कि जब नये ग्रन्थ की रचना की जाय, तब उस ग्रन्थ के शुरू करने में किसी उत्तम शब्द का लिख देना उसको मंगलाचरण कहते हैं, ऐसा समझना ठीक नहीं, क्योंकि पहिले तो मंगलाचरण का वैसा अर्थ नहीं हो सकता, दूसरे यदि ग्रन्थ के आदि में मङ्गल किया तो अन्यत्र अमंगल होगा ; तीसरे कादम्बर्यादि ग्रन्थों में मङ्गल के होने पर भी उनकी निर्विघ्न समाप्ति नहीं हुई, इस वास्ते ऐसा मानना किसी प्रकार श्रेष्ठ नहीं । इस विषय को संक्षेपतः लिया है, इसका विस्तार बहुत है । अन्य ग्रन्थों में कर्म का फल अपने आप होता है, इस पक्ष का खण्डन करते हैं ।

( १२५ ) नेश्वराधिष्ठिते फलनिष्पत्तिः कर्मणा तत्सिद्धेः॥२ अर्थ—केवल ईश्वर का नाम लेने से अर्थात् मंगलाचरण से फल नहीं मिल सकता, किन्तु उसका हेतु कर्म है, जिसके होने से ईश्वर फल देता है, यदि कहो विना कर्म के ईश्वर फल देता है। स्वोपकारादधिष्ठानं लोकवत् ॥ ३ ॥ अर्थ—जैसे कि संसार में दीखता है, कि पुरुष अपने उप- कार के वास्ते कर्मों का फल देनेवाला एक भिन्न नियुक्त करता है, इसी तरह ईश्वर भी सब के कर्म फल देने के वास्ते एक अधिष्ठान है। लौकिके श्वरवदितरथा ॥ ४ ॥ अर्थ—यदि ईश्वर को सब कर्मों का फल देने वाला न माना जाय, तो लौकिक ईश्वरों की तरह भिन्न-भिन्न कर्मों के फल देने वाले भिन्न-भिन्न ईश्वर मानने पड़ेंगे, जैसे—संसार में जज, कलक्टर इत्यादिक भिन्न-भिन्न कर्मों के फल देने वाले भिन्न- भिन्न ईश्वर हैं ; लेकिन इन लौकिक ईश्वरों में भ्रम, प्रमाद इत्या- दिक दोष दीखते हैं। यही दोष उस ईश्वर में भी दीख पड़ेंगे। इसवास्ते ऐसा मानना योग्य नहीं, कि कर्म का फल ईश्वर नहीं देता। पारिभाषिको वा ॥ ५ ॥ अर्थ—कर्म का फल अपने आप होता है, ऐसा मानने से एक दोष और भी प्राप्त होता है, वह दोष यह है कि ईश्वर केवल नाममात्र ही रह जायगा, क्योंकि कर्मों का फल तो आप ही हो जाता है, फिर ईश्वर की क्या आवश्यकता रही। और ईश्वर के

( १२६ ) नाममात्र ही रह जाने में यह भी दोष होगा, कि वर्तमान् संसार की सिद्धि भी न हो सकेगी । . न रागादृते तत्सिद्धिः प्रतिनियतकारणत्वात्॥६॥ अर्थ—ईश्वर सृष्टि की सिद्धि में प्रति_नियत कारण है, उसके बिना केवल राग से अर्थात् प्रकृति महदादिकों से संसार की सिद्धि नहीं हो सकती । प्र०—ईश्वर, जीव रूपधारी प्रकृति का सङ्गी है, और उस में प्रकृति के संयोग होने से रागादिक भी हैं ? उ०—तद्योगेऽपि न नित्यमुक्तः ॥ ७ ॥ अर्थ—तुम्हारा यह कथन योग्य ( सत्य ) नहीं, क्योंकि ईश्वर नित्य मुक्त न रहेगा, अर्थात् जैसे जीव प्रकृति के संगी होने से अनित्य मुक्त है । इसी तरह ईश्वर को भी मानना पड़ेगा । और जो लोग इस तरह ईश्वर को मानते हैं, उनका ईश्वर भी संसार के जीवों के समान अनित्य मुक्त होगा । यदि ऐसा कहा जावे कि ईश्वर से संसार बना है, अर्थात् ईश्वर उपादान कारण है, सो भी सत्य नहीं । प्रधानशक्तियोगाच्चेत् संगापत्तिः ॥ ८ ॥ अर्थ—यदि ईश्वर को प्रधान शक्ति का योग हो, तो पुरुष में सङ्गापत्ति हो जाय, अर्थात् जैसे प्रकृति सूक्ष्म से मिलकर कार्य- रूप में संगत हुई है, वैसे ईश्वर भी स्थूल हो जाय ; इसवास्ते ईश्वर जगत् का उपादान कारण नहीं हो सकता, किन्तु निमित्त- कारण है । सत्तामात्राच्चेत् सर्वैश्वर्यम् ॥ ६ ॥

  • अर्थ—अगर चेतन से जगत् की उत्पत्ति है, तो जिस प्रकार

( १२७ ) ॰ परमेश्वर सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त है, इसी तरह सब संसार भी सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त होना चाहिये, लेकिन संसार में यह बात नहीं दीखती, इस हेतु से भी परमेश्वर जगत् का उपादान कारण सिद्ध नहीं होता, किंतु निमित्त कारण ही सिद्ध होता है और भी पुष्टिकार का इस विषय का यह सूत्र है— प्रमाणाभावान्न तत्सिद्धिः ॥ १० ॥ अर्थ-ईश्वर संसार का उपादान कारण है इसमें कोई प्रमाण नहीं है, इसवास्ते उसकी सिद्धि नहीं हो सकती । सम्बन्धाभावान्नानुमानम् ॥ ११ ॥ अर्थ—जबकि ईश्वर का संसार से उपदान कारण रूप संबन्ध ही नहीं है, तब ऐसा अनुमान करना कि ईश्वर ही से जगत् उत्पन्न हुआ है, व्यर्थ है । श्रुतिरपि प्रधानकार्यत्वस्य ॥ १२ ॥ अर्थ—जगत् का उपादान कारण प्रकृति ही है इस बात को श्रुतियाँ भी कहती हैं । “अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां वह्वीः प्रजाः सृजमानां स्वरूपाः” । यह श्वेताश्वेतर उपनिषद् का वाक्य है, इसका यह अर्थ है कि जो जन्म-रहित सत्त्व, रज, तमोगुण रूप प्रकृति है वही स्वरूपाकार से बहुत प्रजारूप हो जाती है अर्थात् परिणामिनी होने से अवस्थान्तर हो जाती है और ईश्वर अपरिणामी और असंगी है । कोई-कोई ऐसा मानते हैं, कि ईश्वर को अविद्या सँग होने से बंधन में पड़ना पड़ता है, और उसी के योग से यह संसार है, इस मत का खंडन करते हैं । नाविद्याशक्तियोगो निः संगस्य ॥ १३ ॥ अर्थ—ईश्वर निःसंग है, इसवास्ते उस ईश्वर को अविद्या- शक्ति का योग नहीं हो सकता ।

( १२८ ) तद्योगे तत्सिद्धावन्योऽन्याश्रयत्वम् ॥ १४ ॥ अर्थ—यदि अविद्या के योग से संसार की सिद्धि मानी जाय, तो अन्योन्याश्रयत्व दोष प्राप्त होता है, क्योंकि बिना ईश्वर अविद्या संसार को नहीं कर सकती, और ईश्वर बिना अविद्या के संसार नहीं बना सकता, यही दोष हुआ। यदि अविद्या और ईश्वर इन दोनों को एक-कालिक ( एक समय में होने वाले ) अनादि मानें, जैसे—बीज और अंकुर को मानते हैं, यह भी सत्य नहीं; क्योंकि— न बीजांकुरवत् सादिश्रुतेः ॥ १५ ॥ अर्थ—बीज और अंकुर के समान अविद्या और ईश्वर को मानें, तो यह दोष प्राप्त होता है । “सदेव सौम्येदमग्र आसीत्, एकमवाद्वितीयं ब्रह्म”। हे सौम्य ! पहिले यह जगत् सत् ही था, एक ही अद्वितीय ईश्वर है, इत्यादि श्रुतियाँ एक ही ईश्वर को प्रतिपादन करती हैं, और जगत् को सादि और ईश्वर को अद्वि- तीय कहती हैं। अगर उसके साथ अविद्या का झगड़ा लगाया जावे, तो उक्त श्रुतियों में विरोध हो जायगा। यदि ऐसा कहा जाय, कि हमारी अविद्या योगशास्त्र की-सी नहीं है, किंतु जैसी आपके मत में प्रकृति है, वैसी ही हमारे मत में अविद्या है, तो यह मत भी सत्य नहीं है। विद्यातोऽन्यत्वे ब्रह्मबाधप्रसङ्गः ॥ १६ ॥ अर्थ—यदि विद्या से अतिरिक्त ( दूसरे ) पदार्थ का नाम अविद्या है, अर्थात् विद्या का नाश करनेवाली अविद्या है, तो ब्रह्म का भी अवश्य नाश करेगी; क्योंकि वह भी विद्यामय है, और इस सूत्र का दूसरा यह भी अर्थ है। यदि अविद्या विद्या रूप ब्रह्म से अतिरिक्त है और उसको विविध ( अनेक प्रकार के

( १२६ ) क ) परिच्छेद रहित ब्रह्म में माना जाता है, और ब्रह्म अविद्या से अन्य ( अर्थात् दूसरा ) है और अविद्या ब्रह्म से अन्य है, तो ब्रह्म के परिच्छेद रहित तत्व में बाधा पड़ेगी, इसवास्ते ऐसा मानना सत्य नहीं । प्र०—अविद्या का किसी से बाध हो सकता है, या नहीं ? इसका ही विचार करते हैं— अबाधे नैष्फल्यम् ॥ १७ ॥ अर्थ—उस अविद्या का अगर किसी से बाध नहीं हो सकता, तो मुक्ति आदि विद्याप्राप्ति का उपाय करना निष्फल है । विद्याबाध्यत्वे जगतोऽप्येवम् ॥ १८ ॥ अर्थ—यदि विद्या से अविद्या का बाध हो जाता है, तो अविद्या से उत्पन्न हुये जगत् का भी बाध होना चाहिये । तद्रूपत्वे सादित्वम् ॥ १९ ॥ अर्थ—यदि अविद्या को जगत्रूप मानें, अर्थात् जगत् ही अविद्या है, तो अविद्या में सादिपना आया जाता है, क्योंकि जगत् सादि है । इसवास्ते अविद्या कोई वस्तु नहीं है, उसी बुद्धिवृत्ति का नाम अविद्या है, जो महर्षि पातञ्जलि ने कही है । और इस विषय में यह भी विचार होता है, कि जब कपिलाचार्य के मत में सम्पूर्ण कार्यों की विचित्रता का हेतु प्रकृति है, और वही प्रकृति सुख दुःखादिक का हेतु है, तो धर्म्माधर्म के मानने की क्या आवश्यकता है । अब इसी पर विचार करके धर्म की सिद्धि करते हैं । उ०—न धर्मऽपलापःप्रकृतिकार्यवैचित्र्यात् ॥२०॥ अर्थ—प्रकृति के कार्यों की विचित्रता से धर्म का अपलाप ( दूर होना ) नहीं हो सकता, क्योंकि—

( १३० ) श्रुतिलिंगादिभिस्तत्सिद्धिः ॥ २१ ॥ अर्थ—उसकी सिद्धि श्रुति और योगियों के प्रत्यक्ष से हो सकती है । “पुण्यो वै पुण्येन भवति पापः पापेन” पुण्य निश्चय करके पुण्य से होता है, और यह भी निश्चय है, कि पाप, पाप से ही उत्पन्न होता है, इत्यादि श्रुतियाँ भी धर्म के फल को कहती हैं, इसवास्ते धर्म का अपलाप नहीं हो सकता । प्र०—धर्म में कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, इस वास्ते उसकी सिद्धि नहीं हो सकती ? उ०—न नियमः प्रमाणान्तरावकाशात् ॥ २२ ॥ अर्थ—धर्म की सिद्धि प्रत्यक्ष प्रमाण से ही हो, यह कोई नियम नहीं है, क्योंकि इसमें अनेक प्रमाण हैं, और प्रत्यक्ष प्रमाण के सिवाय और प्रमाणों से भी पदार्थ की सिद्धि होती है । प्र०—धर्म की तो सिद्धि इस तरह करली गई, लेकिन अधर्म की तो सिद्धि किसी प्रमाण से नहीं हो सकती ? उ०—उभयत्राप्येवम् ॥ २३ ॥ अर्थ—जैसे धर्म की सिद्धि में प्रमाण पाए जाते हैं इसी तरह अधर्म की सिद्धि में भी प्रमाण पाये जाते हैं । अर्थात् सिद्धिश्चेत् समानमुभयोः ॥ २४ ॥ अर्थ—वेदादि सत् शास्त्रों में जिस बात की विधि पाई जाती है वही धर्म है, और इसके सिवाय अधर्म है। यदि इस प्रकार की अर्थापत्ति निकाली जाय, तौ भी ठीक नहीं, क्योंकि श्रुति आदिकों में जिस प्रकार धर्म की विधियों का वर्णन है उस ही प्रकार अधर्म का निषेध भी है, जैसे—“परदारान्नगच्छेत्” पराई स्त्री के समीप

सूत्र में जो आदि शब्द है, उसके कहने से वैशेषिक शास्त्र के

( १३१ ) गमन न करे, इस तरह के वाक्य धर्माधर्म दोनों के विषय में ही निषेध और विधिरूप से बराबर पाये जाते हैं । प्र०—यदि धर्मादि को आप मानते हैं, तो पुरुष को धर्मवाला मानकर पुरुष में परिणामित्व प्राप्त होता है ? उ०—अन्तःकरणधर्मत्वं धर्मादीनाम् ॥ २५ ॥ अर्थ—धर्मादिक अन्तःकरण के धर्म हैं, अर्थात् इन धर्मा- दिकों का संबंध अन्तःकरण से है, जीव से नहीं है, और इस सूत्र में जो आदि शब्द है, उसके कहने से वैशेषिक शास्त्र के आचार्यों ने जो आत्मा के विशेष गुण माने हैं, उनका ही ग्रहण माना गया है अर्थात् वही आत्मा के विशेष गुण माने गये हैं । प्रलयावस्था में तो अन्तःकरण रहता ही नहीं, तब धर्मादिक कहां रहते हैं, ऐसा तर्क नहीं करना चाहिये । कारण यह है कि आकाश के समान अन्तःकरण भी नाश रहित है, अर्थात् अन्तःकरण का नाश सिवाय मुक्ति के कदापि नहीं होता, और इस बात को पहिले कह भी चुके हैं, कि अन्तःकरण कार्य- कारणभाव दोनों रूप को धारण करता है । इससे अन्तःकरण रूप जो प्रकृति का अंश विशेष है, उससे धर्म अधर्म दोनों के संस्कार रहते हैं । इस बात को ही किसी कवि ने भी कहा है, कि धर्म नित्य है । और सुख दुःखादि सब अनित्य हैं । इस विषय में यह संदेह भी उत्पन्न होता है, कि प्रकृति के कार्यों की विचित्रता से जो धर्म अधर्म आदि की सिद्धि की गई है वह सत्य नहीं, क्योंकि प्रकृति तो त्रिगुणात्मक अर्थात् रजोगुण, तमोगुण, सत्त्वगुण, इनसे युक्त है, और उसके कार्यों का बाध इन श्रुतियों से प्रत्यक्ष मालूम पड़ता है । "वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” घट-पट आदि सब कहनेमात्र को ही हैं, केवल मृत्तिका (मिट्टी) ही सत्य है । इसवास्ते

( १३२ ) प्रकृति के गुण मानना सत्य नहीं, इस पक्ष के खण्डन के वास्ते यह सूत्र है— गुणादीनां च नात्यन्तबाधः ॥ २६ ॥ अर्थ—गुण जो सत्वादिक अर्थात् सत्व, रज, तम, उनके धर्म जो सुखादिक और उनके कार्य जो महदादिक हैं, उनका स्वरूप से बाध्य नहीं है, अर्थात् स्वरूप से नाश नहीं होता ; किन्तु संसर्ग से बाध्य होता है, जैसे—आग के संसर्ग ( मेल ) से जल की स्वाभाविक शीतलता का बाध्य हो जाता है, परन्तु उसके स्वरूप का बाध्य नहीं होता ; इसी तरह प्रकृति के गुणों का भी बाध्य नहीं होता । पंचऽवयवयोगात् सुखसंवित्तिः ॥ २७ ॥ अर्थ—सुखादि पदार्थों की सिद्धि पंचावयव वाक्य से होती है, जिस तरह न्याय-शास्त्र में मानी गई है। इस कारण जब सुख आदि की सिद्धि न्याय-शास्त्र के अनुसार मान ली जाती है, तब उनका स्वरूप से नाश भी नहीं माना जा सकता। क्यों- कि जो पदार्थ सत् है, उसका नाश नहीं हो सकता, और उस पंचावयव वाक्य से सुखादि की संवित्ति इस तरह होती है, कि प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन इन पाँचों को सुख में इस तरह लगाना चाहिये, कि सुख सत् है, इसका नाम प्रतिज्ञा है ; प्रयोजन क्रियाकारी होने से इसका नाम हेतु है, जैसे चेतन प्रयोजन की क्रियाओं का कर्त्ता है, उसी तरह इसका नाम भी दृष्टान्त है। पुलकित ( रूंओं का खड़ा होना ) आदि प्रयोजन की क्रिया सुख में है, इसका नाम उपनयन है ; इस- वास्ते वह सच्चा है, यह निगमन है। यहाँ केवल सुख का ग्रहण करना नाममात्र ही है। इसी तरह और गुणों का स्वरूप से

( १३३ ) नाश नहीं होता। इस जगह आचार्य ने न्याय का विषय इसवास्ते वर्णन किया है, कि इन पाँच बातों के बिना किसी झूठे-सच्चे पदार्थ का निश्चय नहीं हो सकता, और जो इस पंचावयव से सिद्ध नहीं हो सकता उसमें अनुमान करना भी सत्य नहीं, और एक नास्तिक जोकि प्रत्यक्ष के सिवाय और प्रमाणों को नहीं मानता, और इस पंचावयव के मुख्य सिद्धान्त व्यक्ति का खंडन करने के आशय से इस सत्ताइसवें सूत्र से उसमें दोष और अनुमान को असंगत बतलाता है। न सकृद्ग्रहणात्संबन्धसिद्धिः ॥ २८ ॥ अर्थ—जहाँ धुँआ होगा, वहाँ अग्नि भी होगी। इस साह- चर्य के स्वीकार ( मानने ) से व्याप्तिरूपी संबन्ध की सिद्धि नहीं होती ; क्योंकि आग में धुँआ सदा नहीं रहता, और जो महानस ( रसोई के स्थान ) का दृष्टान्त दिया जाता है, वह भी सत्य नहीं है, क्योंकि किसी जगह अग्नि और घोड़ा इन दोनों को किसी आदमी ने देखा, अब दूसरी जगह उसको घोड़ा नज़र पड़ा, तब वह ऐसा अनुमान नहीं कर सकता, कि यहाँ अग्नि भी होगी ; क्योंकि घोड़ा दीखता है। ऐसे ही अग्नि और घोड़ा मैंने वहाँ भी देखा था। बस इस पूर्वपक्ष से नैयायिक जैसा अनुमान करते हैं, वह अयुक्त सिद्ध हुआ, और प्रत्यक्ष को ही माननेवाले चार्वाक नास्तिक के मत की पुष्टि हुई। इसका यह उत्तर है— नियतधर्मसाहित्यमुभयोरेकतरस्य वा व्याप्तिः२९ अर्थ—जिन दो पदार्थों का व्याप्य-व्यापक भाव होता है, उन दोनों पदार्थों में से एक का अथवा दोनों का जो नियत धर्म है, उसके साहित्य ( साथ रहने का नियम ) होने को व्याप्ति

( १३४ ) कहते हैं । विशेष व्याख्या इस तरह है, कि जैसे पहाड़ पर आग है, क्योंकि धुँआ दीखता है। जहाँ-जहाँ धुंआँ होता है, वहीं- वहीं आग भी अवश्य होती है । इसका नाम ही व्याप्ति है। इससे यह जानना चाहिये, कि धुँआँ बिना आग के नहीं रह सकता, परन्तु आग बिना धुएँ के रह सकती है ; इससे सिद्ध हुआ, कि धुएँ का आग के साथ रहना नियत धर्म-साहित्य है; परन्तु यह एक का नियत धर्म-साहित्य हुआ । चार्वाक ने जो अग्नि घोड़े का दृष्टान्त देकर व्याप्ति का खण्डन किया था, वह भी सत्य नहीं हो सकता ; क्योंकि घोड़ा तो सैकड़ों जगह बिना अग्नि के दीखने में आता है और आग को बिना घोड़े के देखते हैं, इस वास्ते वह साहचर्य नहीं रहा, अतएव वह सब अयुक्त सिद्ध हो गया । अब रहा दोनों का नियत धर्म-साहित्य वह गंध और पृथिवी में मिलता है, अर्थात् जहाँ पृथिवी होगी, वहाँ गंध अवश्य होगा, और जहाँ गंध होगी वहाँ पृथिवी भी अवश्य होगी। इन दोनों में से बिना एक के एक नहीं रह सकता है। न तत्वान्तरं वस्तुकल्पनाऽप्रसक्तेः ॥ ३० ॥ अर्थ—पहिले सूत्र में जो व्याप्ति का लक्षण किया गया है, उसके सिवाय किसी और पदार्थ का नाम व्याप्ति नहीं हो सकता, क्योंकि इस प्रकार अनेक तरह की व्याप्ति मानने में एक नया पदार्थ कल्पना करना पड़ेगा। इस वास्ते व्याप्ति का वही लक्षण सत्य है जो पहिले सूत्र में किया है । निजशक्त्युद्भवमित्याचार्याः ॥ ३१ ॥ अर्थ—जो व्याप्य की शक्ति से उत्पन्न किसी विशेष शक्ति का रूप हो, वही व्याप्ति आचार्यों के मत में मानने लायक है। इस सूत्र का आशय इस दृष्टान्त से समझाना चाहिये, कि व्याप्य

( १३५ ) जो अग्नि है, उसकी ही शक्ति से धुंआँ उत्पन्न होता है, और वह धुआँ आग की किसी विशेष शक्ति का रूप है । इसी तरह के पदार्थ को व्याप्ति कहते हैं ; और जिस में यह बात नहीं है, वह व्याप्ति किसी प्रकार नहीं हो सकती । प्र०—धुआँ आग की शक्ति से पैदा नहीं होता है, गीले ईंधन की शक्ति से पैदा होता है ? उ०—यह कहना ठीक नहीं है, यदि गीले ईंधन में ऐसी शक्ति होती तो वायु ( हवा ) के संयोग होने से ईंधन में से धुआँ क्यों नहीं उत्पन्न होता परन्तु ऐसा देखने में नहीं आता ; इससे यह बात माननी पड़ेगी कि धुआँ अग्नि की शक्ति विशेष है । आधेयशक्तियोग इति पञ्चशिखः ॥ ३२ ॥ अर्थ—आधार में जो आधेय-शक्ति रहती है, उसको ही पंचशिख नाम वाले आचार्य व्याप्ति मानते हैं । इसका आशय भी इस दृष्टान्त से समझ लेना चाहिये, कि आधार जो आग है, उसमें आधेय जो धुआँ, उसके रहने की जो शक्ति है, उसको व्याप्ति कहते हैं । प्र०—जब आग में धुआँ नहीं दीखता है, तब उसमें व्याप्ति का नाश हो जाता है क्या ? उ०—नहीं ! क्योंकि धुएं का आविर्भावतिरोभाव होता रहता है, अर्थात् धुआँ कभी उत्पन्न होता है कभी उसी के भीतर लय हो जाता है ; किन्तु आग से धुआँ नाश नहीं होता है । इसवास्ते व्याप्ति का नाश नहीं हो सकता, इसको पहले अध्याय में विस्तार- पूर्वक कह आये हैं । प्र०—आधार में आधेय शक्तिमत्व क्यों कल्पना किया जाता है, आधार की स्वरूपशक्ति को ही व्याप्ति क्यों नहीं मानते ?

( १३६ ) उ०—न स्वरूपशक्तिर्नियमः पुनर्वादिप्रसक्तेः॥३३ अर्थ—व्याप्य ( आधार ) की स्वरूपशक्ति को नियम अर्थात् व्याप्ति नहीं मान सकते ; क्योंकि उसमें फिर झगड़ा पड़ने का भय है। अब उस झगड़े को लिखते हैं कि जिसका भय है— विशेषणानर्थक्यप्रसक्तेः ॥ ३४ ॥ अर्थ—विशेषण देना व्यर्थ हो जायगा, जैसे कहा गया है, कि बहुत धुएँ वाली आग है। इस वाक्य में 'बहुत' शब्द विशेषण है, और 'धुआँ' विशेष्य है ; इसी तरह 'धुआँ' आधेय है, और आग आधार है। यदि धुएँ को अग्नि की स्वरूपशक्ति मान लें, तो बहुत शब्द को क्या मानें ; क्योंकि उस 'बहुत' शब्द को अग्नि की स्वरूपशक्ति नहीं मान सकते, और उस वाक्य के साथ होने से वह शब्द अपना कुछ अर्थ भी अवश्य रखता है, एवं उस अर्थ से स्वरूप शक्ति में न्यूनाधिकता ( कमती-बढ़ती ) भी अवश्य हो जाती है, तो उसको भी कुछ न कुछ अवश्य मानना चाहिये। यदि न माना जायगा, तो उसका उच्चारण करना व्यर्थ हुआ जाता है, और महात्माओं के अक्षर व्यर्थ नहीं होते। और भी दूसरा झगड़ा प्राप्त होता है कि— पल्लवादिष्वनुपपत्तेश्च ॥ ३५ ॥ अर्थ—जैसेकि पत्तों का आधार पेड़ है, और व्याप्ति का लक्षण स्वरूपशक्ति मानकर वृक्ष की शक्तिस्वरूप जो पत्ते हैं, वही व्याप्ति के कहने से ग्रहण हो सकते हैं। इस प्रकार मानने में यह दोष रहेगा, कि जैसे वृक्ष की स्वरूपशक्ति पत्तों को मान लिया, और वही व्याप्ति भी होगई, तो पत्तों के टूटने पर व्याप्ति का भी नाश मानना पड़ेगा। यदि व्याप्ति का नाश माना जायगा, तो बड़ाभारी झगड़ा उत्पन्न हो जायगा, और

( १३७ ) प्रत्यक्षवादी चार्वाक नास्तिक का मत पुष्ट हो जायगा, इसवास्ते ऐसा न मानना चाहिये, कि आधार की स्वरूपशक्ति का ही नाम व्याप्ति है। अब इस बात का निश्चय करते हैं, कि आचार्य और पंचशिख नामक आचार्य के मत में भेद है या नहीं। क्योंकि पंचशिख नाम वाला आचार्य तो आधार ( आग ) में आधेय ( धुवें ) की शक्ति होने को व्याप्ति मानता है ; और आचार्य मुनि कपिलजी व्याप्त आग की शक्ति से उत्पन्न हुये सिीक विशेष शक्ति को दूसरा पदार्थ मानकर उसको व्याप्ति मानते हैं। इन दोनों में से कौन सत्य है ? आधेय शक्ति सिद्धौ निज शक्ति योगः समा- नन्यायात् ॥ ३६ ॥ अर्थ—समानन्याय अर्थात् बराबर युक्ति होने से जैसेकि आधेय-शक्ति की सिद्धि होती है वैसे ही निज-शक्तियोग की, यह आचार्यों का मत भी सत्य है। दोनों में से कोई भी युक्ति हीन नहीं मानते हैं। यह व्याप्ति का झगड़ा केवल इसी वास्ते उत्पन्न किया गया था कि गुण आदि स्वरूप से नाशवान नहीं है। इस पक्ष की पुष्टि करने के वास्ते आचार्य को अनुमान प्रमाण की आवश्यकता हुई और वह अनुमान प्रमाण पंचावयव के बिना नहीं हो सकता था, इस वास्ते उनको लिखन पड़ा। इसी निश्चय में पंचावयव के अन्तर्गत एक साहचर्य नियम जिसका दूसरा नाम व्याप्ति आन पड़ा उसको प्रकाश करने के वास्ते यह कहकर अपने पक्ष को पुष्ट कर लिया। अब इससे आगे पंचावयव रूप शब्द को ज्ञान की उत्पत्ति में हेतु सिद्ध करने के वास्ते शब्द की शक्तियों का प्रकाश करके उस शब्द-प्रमाण में बाधा डालने वालों के मत का खण्डन करते हैं—

( १३८ ) वाच्यवाचकभावः सम्बन्धः शब्दार्थयोः ॥३७॥ अर्थ—शब्द के अर्थ में वाच्यता-शक्ति रहती है, और शब्द में वाचता-शक्ति रहा करती है, इसको ही शब्द और अर्थ का वाच्य-वाचकभाव-सम्बन्ध कहते हैं, अर्थात् शब्द अर्थ को कहा करते हैं, और अर्थ शब्द में कहा जाता है । यही इन शब्दार्थों का सम्बंध है । उस वाच्य-वाचकतारूप-शक्ति को कहते हैं । त्रिभिः सम्बन्ध सिद्धिः ॥ ३८ ॥ अर्थ—पहिले कहे हुये सम्बन्ध की सिद्धि तीन तरह से होती है—एक तो आप्त ( पूर्ण विद्वान् ) के उपदेश से; दूसरे वृद्धों के व्यवहार से ; तीसरे संसार में जो प्रसिद्ध बर्ताव में आने- वाले पद हैं, उनके देखने से । इन ही तीन तरह के शब्दों का वाच्य-वाचकभाव होता है । उसको इस तरह समझना चाहिये, कि आप्तों के द्वारा ऐसे शब्दों का ज्ञान होता है, जैसे ईश्वर निराकार सत्चित्आनन्दस्वरूप है। जब ईश्वर शब्द कहा जावेगा, तब पूर्वोक्त ( पहिले कहे हुए ) विशेषण वाले पदार्थ का ज्ञान होगा, और वृद्धों के व्यवहार से यह मालूम होता है, कि जिसके सास्ना ( गौ के कंधों के नीचे जो लंबी सी खल लटकती है ) और लांगूल ( पूंछ ) होती है, उसको गौ कहते हैं, ऐसा ज्ञान हो जाने पर जब-जब गौ शब्द का उच्चारण होगा, तब उसी अर्थ का ज्ञान हो जायगा, और प्रसिद्ध शब्दों का व्यवहार इस तरह है, कि जैसे कपित्थ एक वृक्ष का नाम है, वह क्यों कपित्थ शब्द से प्रसिद्ध है ? इस प्रकार का तर्क न करना चाहिये ; क्योंकि लोकप्रसिद्ध होने के कारण कपित्थ शब्द कहने से कपित्थ ( कैथ ) का ही ग्रहण होता है । न कार्ये नियम उभयथा दर्शनात् ॥ ३६ ॥

( १३६ ) अर्थ—यह कोई नियम नहीं है, कि शब्द-शक्ति का वाच्य- वाचकभाव कार्य में ही हो, और जगह नहीं ; क्योंकि दोनों तरह शब्द की शक्तियों का ग्रहण दीखता है। शास्त्रों में जैसे किसी वृद्ध ने बालक से कहा “गौ को लाओ”। इस वाक्य के कहने से गौ का लाना यह कार्य दीखता है, और इसके शब्द भी उस अर्थ को ही दिखलाते हैं, और तेरे पुत्र उत्पन्न हो गया इसमें कार्य का प्रत्यक्ष भाव नहीं दिखाई पड़ता है। क्योंकि पुत्र का उत्पन्न होना यह जो क्रिया है वह पहिले ही हो चुकी और यह वाक्य उस बीती हुई क्रिया को कहता है; इस वास्ते यह नियम नहीं कि कार्य में ही शब्द और अर्थ का सम्बन्ध हो। प्र०—यह उपरोक्त प्रतीति लौकिक बातों में हो सकती है, क्योंकि संसार में बहुधा कार्य शब्दों का प्रयोग किया जाता है; किन्तु वेद में जो शब्द हैं, उनके अर्थ का ज्ञान कैसे होता है? क्योंकि शब्द कार्य नहीं है। उ०—लोके व्युत्पन्नस्य वेदार्थप्रतीतिः ॥४०॥ अर्थ—जो मनुष्य सांसारिक कार्यों में चतुर होते हैं, वही वेद को यथार्थ रीत से जान सकते हैं, क्योंकि ऐसा कोई भी लोक का हितकारी कार्य नहीं है, जो वेद में न हो; इसवास्ते वेद में विज्ञता उत्पन्न करने के अर्थ सांसारिक जीवों को योग्यता प्राप्त करनी चाहिये और शब्दों की शक्ति लोक ( संसार ) और वेद इन दोनों में बराबर है। इस विषय पर नास्तिक शंका करते हैं— न त्रिभिरपौरुषेयत्वाद्वेदस्य तदर्थस्यातीन्द्रिय- त्वात् ॥४१॥ अर्थ—आपने जो तीन प्रमाण दिये उन प्रमाणों से वेद के अर्थ की प्रतीति नहीं हो सकती, क्योंकि मनुष्य मनुष्य की बात

( १४० ) का समझ सकता है, परन्तु वेद अपौरुषेय ( जो किसी मनुष्य का बनाया हुआ न हो ) है, इसवास्ते उसका अर्थ इन्द्रियों से ज्ञात नहीं हो सकता है ; क्योंकि वह वेद अतीन्द्रिय है, अर्थात् इन्द्रियों की शक्ति से बाहर है । इसका समाधान करने के वास्ते पहिले इस बात को सिद्ध करते हैं कि वेदों का अर्थ प्रत्यक्ष देखने में आता है, अतीन्द्रिय नहीं है । न यज्ञादेः स्वरूपतो धर्मत्वं वैशिष्ट्यात् ॥४२॥ अर्थ—वेद के अर्थ को जो अतीन्द्रिय ( इन्द्रियों से न जाना जाय ) कहा सो सत्य नहीं । वेद से जो यज्ञादि किये जाते हैं, और उन यज्ञादिकों में जो-जो काम किये जाते हैं, वे सब स्वरूप से ही धर्म हैं, क्योंकि उन यज्ञादिकों का फल प्रत्यक्ष में दीखता है, जैसे—“यज्ञाद्भवतिपर्जन्यः पर्जन्यादन्नसम्भवः” । यज्ञ से मेघ होता है, और मेघ के होने से अन्न उत्पन्न होता है, इत्यादि वाक्य गीता में मिलते हैं । प्र०—जबकि वेद अपौरुषेय हैं, तब उनका अर्थ कैसे ज्ञात होता है ? उ०—निजशक्तिव्युत्पत्या व्यवच्छिद्यते ॥४३॥ अर्थ—शब्द का अर्थ होना यह शब्द की स्वाभाविकी शक्ति है, और विद्वानों की परम्परा से वह शक्ति वेद के अर्थों में भी चली आती है, और उसी व्युत्पत्ति ( वाक़फ़ियत ) से वृद्ध लोग शिष्यों को उपदेश करते चले आये हैं, कि इस शब्द का ऐसा अर्थ है । और जो ऐसा कहते हैं, कि वेदों का अर्थ प्रत्यक्ष नहीं है, किन्तु अतीन्द्रिय, उसका यह समाधान है । योग्यायोग्येषु प्रतीतिजनकत्वात् तत्सिद्धिः ॥४४॥ अर्थ—ब्रह्मचर्यादि जिन-जिन कार्यों को वेद ने अच्छा कहा है, और हिंसादि जिन-जिन कार्यों को बुरा कहा है, उनकी प्रतीति

( १४१ ) प्रत्यक्षता में दीखती है, अर्थात् इन दोनों कार्यों का जैसा फल वेद में लिखा है वैसा ही देखने में आता है। इससे इस बात की सिद्धि हो गई कि वेद का अर्थ अतीन्द्रिय नहीं है। प्र०—न नित्यत्वं वेदानां कार्यत्वश्रुतेः ॥४५॥ अर्थ—वेद नित्य नहीं है, क्योंकि श्रुतियों से मालूम होता है, कि “तस्माद्यज्ञात्सर्व हुत ऋचः सामानि जज्ञिरे”। उस यज्ञरूप परमात्मा से ऋग्वेद, सामवेद, उत्पन्न हुये इत्यादि श्रुतियाँ पुकार- पुकार कह रही हैं कि वेद उत्पन्न हुये। जब ऐसा सिद्ध हो गया, तो यह बात निश्चय ही है, कि जिसकी उत्पत्ति है, उसका नाश भी अवश्य है; इस वास्ते वेद कार्यरूप होने से नित्य नहीं हो सकते हैं। उ०—न पौरुषेयत्वं तत्कर्त्तुः पुरुषस्याभा- वात् ॥४६॥ अर्थ—वेद किसी पुरुष के बनाये हुये नहीं हैं, क्योंकि उनका बनानेवाला दीखता नहीं। तब यह बात माननी पड़ेगी, कि वेद, अपौरुषेय हैं, जबकि वेदों का अपौरुषेयत्व सिद्ध हो गया, तो वह जिसके बनाये हुये वेद हैं नित्य हैं; और नित्य के कार्य भी नित्य होते हैं, इस कारण वेदों का नित्यत्व सिद्ध हो गया। यदि ऐसा कहा जावे, कि वेदों को भी किसी जीव ने बनाया होगा सो भी सत्य नहीं। मुक्तामुक्तयोरयोग्यत्वात् ॥४७॥ अर्थ—जीव भी दो प्रकार के होते हैं—एक तो मुक्त, दूसरे अमुक्त। यह दोनों प्रकार के जीव वेद के बनाने के अधिकारी नहीं हैं। कारण यह है कि मुक्त जीव में वह शक्ति नहीं रहती, जिससे वेद बना सकें, और बद्ध जीव अज्ञानी अल्पज्ञ (थोड़ा

( १४२ ) जाननेवाला ) इत्यादि दोषों से युक्त होता है और वेद में इस प्रकार की बातें देखने में आती हैं, जो बिना सर्वज्ञ के नहीं हो सकतीं, और जीव अल्पज्ञ है, इस प्रमाण से भी वेदों की नित्यता सिद्ध हो गई। इसी विषय को और भी दृढ़ करते हैं। नापौरुषेयत्वान्नित्यत्वमंकुरादिवत् ॥४८॥ अर्थ—वेद अपौरुषेय हैं, इसवास्ते नित्य हैं, ऐसा नहीं ; क्योंकि अंकुर किसी पुरुष का बनाया हुआ नहीं होता, परन्तु अनित्य होता है। तेषामपि तद्योगे दृष्टबाधादिप्रसक्तिः ॥४९॥ अर्थ—यदि वेदों को भी बनाया हुआ माना जायगा, तो प्रत्यक्ष जो दीखता है, उसमें दोष प्राप्त होगा। दृष्टान्त—जैसे कि अंकुर का लगानेवाला दीखता है और उपादान कारण जो बीज है वह भी दीखता है। इस प्रकार वेदों का बनानेवाला और उपादान कारण नहीं दीखता है, इस कारण नित्य है। यदि नित्य न माना जाय, तो प्रत्यक्ष से विरोध हो जायगा। वेदों को जो अपौरुषेय कहा है, उसमें यह सन्देह होता है कि पौरुषेय किसको कहते हैं और अपौरुषेय किसको कहते हैं ? इस सन्देह को दूर . करने के लिये पौरुषेय का लक्षण लिखते हैं। यस्मिन्नदृष्टेऽपि कृतबुद्धिरुपजायते तत्पौरुषे- यम् ॥५०॥ अर्थ—जिस पदार्थ का कर्त्ता प्रत्यक्ष न हो, अर्थात् बनाने वाला न दीखता हो, लेकिन उस पदार्थ के देखने से यह ज्ञान हो, कि इसका बनानेवाला कोई अवश्य है ; इसका ही नाम पौरु- षेय है। लेकिन वेदों के देखने से यह बुद्धि उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि वेदों की उत्पत्ति ईश्वर में मानी गई है और उन वेदों