भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 192 में से

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( १३५ ) जो अग्नि है, उसकी ही शक्ति से धुंआँ उत्पन्न होता है, और वह धुआँ आग की किसी विशेष शक्ति का रूप है । इसी तरह के पदार्थ को व्याप्ति कहते हैं ; और जिस में यह बात नहीं है, वह व्याप्ति किसी प्रकार नहीं हो सकती । प्र०—धुआँ आग की शक्ति से पैदा नहीं होता है, गीले ईंधन की शक्ति से पैदा होता है ? उ०—यह कहना ठीक नहीं है, यदि गीले ईंधन में ऐसी शक्ति होती तो वायु ( हवा ) के संयोग होने से ईंधन में से धुआँ क्यों नहीं उत्पन्न होता परन्तु ऐसा देखने में नहीं आता ; इससे यह बात माननी पड़ेगी कि धुआँ अग्नि की शक्ति विशेष है । आधेयशक्तियोग इति पञ्चशिखः ॥ ३२ ॥ अर्थ—आधार में जो आधेय-शक्ति रहती है, उसको ही पंचशिख नाम वाले आचार्य व्याप्ति मानते हैं । इसका आशय भी इस दृष्टान्त से समझ लेना चाहिये, कि आधार जो आग है, उसमें आधेय जो धुआँ, उसके रहने की जो शक्ति है, उसको व्याप्ति कहते हैं । प्र०—जब आग में धुआँ नहीं दीखता है, तब उसमें व्याप्ति का नाश हो जाता है क्या ? उ०—नहीं ! क्योंकि धुएं का आविर्भावतिरोभाव होता रहता है, अर्थात् धुआँ कभी उत्पन्न होता है कभी उसी के भीतर लय हो जाता है ; किन्तु आग से धुआँ नाश नहीं होता है । इसवास्ते व्याप्ति का नाश नहीं हो सकता, इसको पहले अध्याय में विस्तार- पूर्वक कह आये हैं । प्र०—आधार में आधेय शक्तिमत्व क्यों कल्पना किया जाता है, आधार की स्वरूपशक्ति को ही व्याप्ति क्यों नहीं मानते ?

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