सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 137, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३६ ) उ०—न स्वरूपशक्तिर्नियमः पुनर्वादिप्रसक्तेः॥३३ अर्थ—व्याप्य ( आधार ) की स्वरूपशक्ति को नियम अर्थात् व्याप्ति नहीं मान सकते ; क्योंकि उसमें फिर झगड़ा पड़ने का भय है। अब उस झगड़े को लिखते हैं कि जिसका भय है— विशेषणानर्थक्यप्रसक्तेः ॥ ३४ ॥ अर्थ—विशेषण देना व्यर्थ हो जायगा, जैसे कहा गया है, कि बहुत धुएँ वाली आग है। इस वाक्य में 'बहुत' शब्द विशेषण है, और 'धुआँ' विशेष्य है ; इसी तरह 'धुआँ' आधेय है, और आग आधार है। यदि धुएँ को अग्नि की स्वरूपशक्ति मान लें, तो बहुत शब्द को क्या मानें ; क्योंकि उस 'बहुत' शब्द को अग्नि की स्वरूपशक्ति नहीं मान सकते, और उस वाक्य के साथ होने से वह शब्द अपना कुछ अर्थ भी अवश्य रखता है, एवं उस अर्थ से स्वरूप शक्ति में न्यूनाधिकता ( कमती-बढ़ती ) भी अवश्य हो जाती है, तो उसको भी कुछ न कुछ अवश्य मानना चाहिये। यदि न माना जायगा, तो उसका उच्चारण करना व्यर्थ हुआ जाता है, और महात्माओं के अक्षर व्यर्थ नहीं होते। और भी दूसरा झगड़ा प्राप्त होता है कि— पल्लवादिष्वनुपपत्तेश्च ॥ ३५ ॥ अर्थ—जैसेकि पत्तों का आधार पेड़ है, और व्याप्ति का लक्षण स्वरूपशक्ति मानकर वृक्ष की शक्तिस्वरूप जो पत्ते हैं, वही व्याप्ति के कहने से ग्रहण हो सकते हैं। इस प्रकार मानने में यह दोष रहेगा, कि जैसे वृक्ष की स्वरूपशक्ति पत्तों को मान लिया, और वही व्याप्ति भी होगई, तो पत्तों के टूटने पर व्याप्ति का भी नाश मानना पड़ेगा। यदि व्याप्ति का नाश माना जायगा, तो बड़ाभारी झगड़ा उत्पन्न हो जायगा, और