सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें( १२४ ) पंचमोऽध्यायः महाप कापिलजी ने अपने शास्त्र का सिद्धांत मुक्ति के साधनों के सम्बन्ध में पहिले चार अध्यायों में विस्तारपूर्वक वर्णन किया, अब इस अध्याय में वादी प्रतिवादी रूप से जो शास्त्र में सूक्ष्मतापूर्वक कही हुई बातें हैं, उनका प्रकाश करेंगे । कोई वादी शंका करता है, कि मंगलाचरण करना व्यर्थ है, इस विषय को हेतु गर्भित वाक्यों से प्रतिपादन करते हैं । मंगलाचरणं शिष्टाचारात् फलदर्शनात् श्रुतितश्चेति ॥ १ ॥ अर्थ—मंगलाचरण करना अवश्य चाहिये ; क्योंकि शिष्टजनों का यही आचार है, और प्रत्यक्ष में भी यही फल दीखता है। जो उत्तम आचरण करता है, वही सुख भोगता है । अहरहः संध्यामुपासीत, अहरहोऽग्निहोत्रं जुहुयात् । रोज-रोज संध्या करनी चाहिये, रोज-रोज अग्निहोत्र करना चाहिये, इत्यादि श्रुतियाँ भी अच्छे ही आचरणों को कहती हैं । बहुतेरे मनुष्य मंगलाचरण का यह अर्थ समझते हैं, कि जब नये ग्रन्थ की रचना की जाय, तब उस ग्रन्थ के शुरू करने में किसी उत्तम शब्द का लिख देना उसको मंगलाचरण कहते हैं, ऐसा समझना ठीक नहीं, क्योंकि पहिले तो मंगलाचरण का वैसा अर्थ नहीं हो सकता, दूसरे यदि ग्रन्थ के आदि में मङ्गल किया तो अन्यत्र अमंगल होगा ; तीसरे कादम्बर्यादि ग्रन्थों में मङ्गल के होने पर भी उनकी निर्विघ्न समाप्ति नहीं हुई, इस वास्ते ऐसा मानना किसी प्रकार श्रेष्ठ नहीं । इस विषय को संक्षेपतः लिया है, इसका विस्तार बहुत है । अन्य ग्रन्थों में कर्म का फल अपने आप होता है, इस पक्ष का खण्डन करते हैं ।