सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३६ ) अर्थ—यह कोई नियम नहीं है, कि शब्द-शक्ति का वाच्य- वाचकभाव कार्य में ही हो, और जगह नहीं ; क्योंकि दोनों तरह शब्द की शक्तियों का ग्रहण दीखता है। शास्त्रों में जैसे किसी वृद्ध ने बालक से कहा “गौ को लाओ”। इस वाक्य के कहने से गौ का लाना यह कार्य दीखता है, और इसके शब्द भी उस अर्थ को ही दिखलाते हैं, और तेरे पुत्र उत्पन्न हो गया इसमें कार्य का प्रत्यक्ष भाव नहीं दिखाई पड़ता है। क्योंकि पुत्र का उत्पन्न होना यह जो क्रिया है वह पहिले ही हो चुकी और यह वाक्य उस बीती हुई क्रिया को कहता है; इस वास्ते यह नियम नहीं कि कार्य में ही शब्द और अर्थ का सम्बन्ध हो। प्र०—यह उपरोक्त प्रतीति लौकिक बातों में हो सकती है, क्योंकि संसार में बहुधा कार्य शब्दों का प्रयोग किया जाता है; किन्तु वेद में जो शब्द हैं, उनके अर्थ का ज्ञान कैसे होता है? क्योंकि शब्द कार्य नहीं है। उ०—लोके व्युत्पन्नस्य वेदार्थप्रतीतिः ॥४०॥ अर्थ—जो मनुष्य सांसारिक कार्यों में चतुर होते हैं, वही वेद को यथार्थ रीत से जान सकते हैं, क्योंकि ऐसा कोई भी लोक का हितकारी कार्य नहीं है, जो वेद में न हो; इसवास्ते वेद में विज्ञता उत्पन्न करने के अर्थ सांसारिक जीवों को योग्यता प्राप्त करनी चाहिये और शब्दों की शक्ति लोक ( संसार ) और वेद इन दोनों में बराबर है। इस विषय पर नास्तिक शंका करते हैं— न त्रिभिरपौरुषेयत्वाद्वेदस्य तदर्थस्यातीन्द्रिय- त्वात् ॥४१॥ अर्थ—आपने जो तीन प्रमाण दिये उन प्रमाणों से वेद के अर्थ की प्रतीति नहीं हो सकती, क्योंकि मनुष्य मनुष्य की बात