भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 192 में से

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( १४० ) का समझ सकता है, परन्तु वेद अपौरुषेय ( जो किसी मनुष्य का बनाया हुआ न हो ) है, इसवास्ते उसका अर्थ इन्द्रियों से ज्ञात नहीं हो सकता है ; क्योंकि वह वेद अतीन्द्रिय है, अर्थात् इन्द्रियों की शक्ति से बाहर है । इसका समाधान करने के वास्ते पहिले इस बात को सिद्ध करते हैं कि वेदों का अर्थ प्रत्यक्ष देखने में आता है, अतीन्द्रिय नहीं है । न यज्ञादेः स्वरूपतो धर्मत्वं वैशिष्ट्यात् ॥४२॥ अर्थ—वेद के अर्थ को जो अतीन्द्रिय ( इन्द्रियों से न जाना जाय ) कहा सो सत्य नहीं । वेद से जो यज्ञादि किये जाते हैं, और उन यज्ञादिकों में जो-जो काम किये जाते हैं, वे सब स्वरूप से ही धर्म हैं, क्योंकि उन यज्ञादिकों का फल प्रत्यक्ष में दीखता है, जैसे—“यज्ञाद्भवतिपर्जन्यः पर्जन्यादन्नसम्भवः” । यज्ञ से मेघ होता है, और मेघ के होने से अन्न उत्पन्न होता है, इत्यादि वाक्य गीता में मिलते हैं । प्र०—जबकि वेद अपौरुषेय हैं, तब उनका अर्थ कैसे ज्ञात होता है ? उ०—निजशक्तिव्युत्पत्या व्यवच्छिद्यते ॥४३॥ अर्थ—शब्द का अर्थ होना यह शब्द की स्वाभाविकी शक्ति है, और विद्वानों की परम्परा से वह शक्ति वेद के अर्थों में भी चली आती है, और उसी व्युत्पत्ति ( वाक़फ़ियत ) से वृद्ध लोग शिष्यों को उपदेश करते चले आये हैं, कि इस शब्द का ऐसा अर्थ है । और जो ऐसा कहते हैं, कि वेदों का अर्थ प्रत्यक्ष नहीं है, किन्तु अतीन्द्रिय, उसका यह समाधान है । योग्यायोग्येषु प्रतीतिजनकत्वात् तत्सिद्धिः ॥४४॥ अर्थ—ब्रह्मचर्यादि जिन-जिन कार्यों को वेद ने अच्छा कहा है, और हिंसादि जिन-जिन कार्यों को बुरा कहा है, उनकी प्रतीति