भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १४१ ) प्रत्यक्षता में दीखती है, अर्थात् इन दोनों कार्यों का जैसा फल वेद में लिखा है वैसा ही देखने में आता है। इससे इस बात की सिद्धि हो गई कि वेद का अर्थ अतीन्द्रिय नहीं है। प्र०—न नित्यत्वं वेदानां कार्यत्वश्रुतेः ॥४५॥ अर्थ—वेद नित्य नहीं है, क्योंकि श्रुतियों से मालूम होता है, कि “तस्माद्यज्ञात्सर्व हुत ऋचः सामानि जज्ञिरे”। उस यज्ञरूप परमात्मा से ऋग्वेद, सामवेद, उत्पन्न हुये इत्यादि श्रुतियाँ पुकार- पुकार कह रही हैं कि वेद उत्पन्न हुये। जब ऐसा सिद्ध हो गया, तो यह बात निश्चय ही है, कि जिसकी उत्पत्ति है, उसका नाश भी अवश्य है; इस वास्ते वेद कार्यरूप होने से नित्य नहीं हो सकते हैं। उ०—न पौरुषेयत्वं तत्कर्त्तुः पुरुषस्याभा- वात् ॥४६॥ अर्थ—वेद किसी पुरुष के बनाये हुये नहीं हैं, क्योंकि उनका बनानेवाला दीखता नहीं। तब यह बात माननी पड़ेगी, कि वेद, अपौरुषेय हैं, जबकि वेदों का अपौरुषेयत्व सिद्ध हो गया, तो वह जिसके बनाये हुये वेद हैं नित्य हैं; और नित्य के कार्य भी नित्य होते हैं, इस कारण वेदों का नित्यत्व सिद्ध हो गया। यदि ऐसा कहा जावे, कि वेदों को भी किसी जीव ने बनाया होगा सो भी सत्य नहीं। मुक्तामुक्तयोरयोग्यत्वात् ॥४७॥ अर्थ—जीव भी दो प्रकार के होते हैं—एक तो मुक्त, दूसरे अमुक्त। यह दोनों प्रकार के जीव वेद के बनाने के अधिकारी नहीं हैं। कारण यह है कि मुक्त जीव में वह शक्ति नहीं रहती, जिससे वेद बना सकें, और बद्ध जीव अज्ञानी अल्पज्ञ (थोड़ा