भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 192 में से

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( १३८ ) वाच्यवाचकभावः सम्बन्धः शब्दार्थयोः ॥३७॥ अर्थ—शब्द के अर्थ में वाच्यता-शक्ति रहती है, और शब्द में वाचता-शक्ति रहा करती है, इसको ही शब्द और अर्थ का वाच्य-वाचकभाव-सम्बन्ध कहते हैं, अर्थात् शब्द अर्थ को कहा करते हैं, और अर्थ शब्द में कहा जाता है । यही इन शब्दार्थों का सम्बंध है । उस वाच्य-वाचकतारूप-शक्ति को कहते हैं । त्रिभिः सम्बन्ध सिद्धिः ॥ ३८ ॥ अर्थ—पहिले कहे हुये सम्बन्ध की सिद्धि तीन तरह से होती है—एक तो आप्त ( पूर्ण विद्वान् ) के उपदेश से; दूसरे वृद्धों के व्यवहार से ; तीसरे संसार में जो प्रसिद्ध बर्ताव में आने- वाले पद हैं, उनके देखने से । इन ही तीन तरह के शब्दों का वाच्य-वाचकभाव होता है । उसको इस तरह समझना चाहिये, कि आप्तों के द्वारा ऐसे शब्दों का ज्ञान होता है, जैसे ईश्वर निराकार सत्चित्आनन्दस्वरूप है। जब ईश्वर शब्द कहा जावेगा, तब पूर्वोक्त ( पहिले कहे हुए ) विशेषण वाले पदार्थ का ज्ञान होगा, और वृद्धों के व्यवहार से यह मालूम होता है, कि जिसके सास्ना ( गौ के कंधों के नीचे जो लंबी सी खल लटकती है ) और लांगूल ( पूंछ ) होती है, उसको गौ कहते हैं, ऐसा ज्ञान हो जाने पर जब-जब गौ शब्द का उच्चारण होगा, तब उसी अर्थ का ज्ञान हो जायगा, और प्रसिद्ध शब्दों का व्यवहार इस तरह है, कि जैसे कपित्थ एक वृक्ष का नाम है, वह क्यों कपित्थ शब्द से प्रसिद्ध है ? इस प्रकार का तर्क न करना चाहिये ; क्योंकि लोकप्रसिद्ध होने के कारण कपित्थ शब्द कहने से कपित्थ ( कैथ ) का ही ग्रहण होता है । न कार्ये नियम उभयथा दर्शनात् ॥ ३६ ॥

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