सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १३ ) कर्म वाला दृष्टांत ठीक नहीं । यह दृष्टांत एक स्थिर आत्मा मानने वालों के मत में तो कुछ घट भी सकता है । प्र०—बन्धन भी ( क्षणिक ) एक क्षण भर रहनेवाला है, इसलिये उसका कारण अर्थात् नियम नहीं, या अभाव ही उसका कारण है, अथवा वह बिना कारण ही है ? उ०—स्थिरकार्य्यासिद्धेः क्षणिकत्वम् ॥ ३४ ॥ अर्थ—यदि तुम बन्धन को ( क्षणिक ) एक क्षण रहनेवाला मानो तो उसमें दीपशिखा अर्थात् दीपज्योति के समान दोनों का कोई स्थिर कार्य उत्पन्न नहीं होगा। इस अगले सूत्र से स्पष्ट करते हैं कि कार्य को क्षणिक मानने में क्या दोष होगा । न प्रत्यभिज्ञावाघात् ॥ ३५ ॥ अर्थ—लोक में कोई भी पदार्थ ( क्षणिक ) अर्थात् एकक्षण रहनेवाला नहीं, क्योंकि यह ज्ञान के सर्वथा विरुद्ध है, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य यह कहता हुआ सुनाई देता है कि जिसको मैंने देखा उसको स्पर्श किया। दृष्टांत यह है कि जैसे कि यदि एक घोड़ा मोल लिया जावे तो क्षणिकवादी के मत में परीक्षा करके मोल लेना असम्भव है ; क्योंकि जिस क्षण में घोड़े को देखा था तब और घोड़ा था, जिस क्षण में हाथ लगाया तब और था, दुबारा देखा तब और हुआ, इस कारण कोई कार्य हो ही नहीं सकता। अतएव जिसके लिये दृष्टांत न हो वह ठीक नहीं ; इसलिये बन्धनादि क्षणिक नहीं वरन् स्थिर हैं और प्रमाण देते हैं— श्रुतिन्यायविरोधाच्च ॥ ३६ ॥ अर्थ—यह कहना कि जगत् एकक्षण रहता है श्रुति अर्थात् वेद और न्याय अर्थात् तर्क से सर्वथा विरुद्ध है, जैसा कि लिखा है—