सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १२ ) नहीं लगेगा। इसका आशय यह है कि जब आत्मा और इन्द्रिय दोनों ही विषय-वासना से समान सम्बन्ध रखते हैं तो इन्द्रियों का बन्धन न कहकर केवल आत्मा ही का बन्धन बतलाना अयुक्त होगा। इस कारण वासना से भी बन्धन नहीं होता। अदृष्टवशाच्चेत् ॥ ३० ॥ प्र०—तो क्या फिर अदृष्ट अर्थात् पूर्व किये धर्म अधर्म से जो एक भोग-शक्ति पैदा होती है उससे बन्धन होता है ? उ०—न द्वयोरेककालायोगादुप कार्य्योपका- रक भावः ॥ ३१ ॥ अर्थ—जब तुम्हारा बन्धन और अदृष्ट एक काल में उत्पन्न होते हैं तो उनमें कर्त्ता और कर्म नहीं हो सकता। जबकि तुम्हारी दृष्टि में संसार प्रत्येक क्षण में बदलता है तो एक स्थिर आत्मा के न होने से दूसरे आत्मा के अदृष्ट से दूसरे आत्मा का बन्धन रूप दोष होगा। प्र०—पुत्रकर्म्मवदिति चेत् ॥ ३२ ॥ अर्थ—जिस प्रकार उसी काल में तो गर्भाधान किया जाता है और उसी समय उसका संस्कार किया जाता है, अतएव एक काल में उत्पन्न होनेवाले पदार्थों में पूर्व कथित सम्बन्ध हो सकता है ? उ०—नास्ति हि तत्र स्थिर एकात्मा यो गर्भा- धानादिना संस्क्रियते ॥ ३३ ॥ अर्थ—तुम्हारे मत में तो एक स्थिर जीवात्मा हा नहीं जिस का गर्भाधानादि से संस्कार किया जावे, अतएव तुम्हारा पुत्र-