भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ११ ) अर्थ—इस आत्मा को अनादि-प्रवाह-रूप-वासना से बन्धन होना भी असम्भव मालूम होता है, क्योंकि निम्नलिखित प्रमाण से अशुद्ध प्रतीत होता है । न बाह्याभ्यन्तरयोरुपरज्योपरंजक भावोऽपि देशव्यवधानात् स्रुघ्नस्थापाटलिपुत्रस्थयोरिव ॥२८॥ अर्थ—जो मनुष्य जीव-आत्मा को शरीर में एक देशी मानते हैं, इस कारण जीव-आत्मा का कुछ भी सम्बन्ध बाह्य विषयों से नहीं रहेगा, क्योंकि आत्मा और जड़ के बीच अति देश का अन्तर है, जैसे—पटने का रहनेवाला बिना आगरे पहुँचे वहाँ के रहनेवाले को नहीं बाँध सकता, इसी प्रकार बाह्य इंद्रियों से उत्पन्न हुई वासना आभ्यन्तरस्थ आत्मा के बन्धन का हेतु किस प्रकार हो सकती है ? और लोक में भी ऐसा ही देखा जाता है कि जब रङ्ग और वस्त्र का सम्बन्ध बिना अन्तर के होता है तब तो वस्त्र पर रङ्ग चढ़ जाता है । यदि उनके बीच कुछ अन्तर हो तो रङ्ग कदापि नहीं चढ़ सकता, अतएव वासना से बन्धन नहीं हो सकता, परन्तु जब लोग आत्मा और बाह्य इन्द्रियों में अन्तर मानते हैं तो इन्द्रियकृत वासना से आत्मा किसी प्रकार बन्धन में नहीं आ सकता । यदि यह कहा जाय कि बाह्य इन्द्रियों का आभ्यन्तर इन्द्रिय मन आदि से सम्बन्ध है और आभ्यन्तर इन्द्रियों का आत्मा से । इस परम्परा सम्बन्ध से आत्मा भी विषय वासना से बद्ध हो सकता है, यह कहना अयुक्त है; क्योंकि— द्वयोरेकदेशलब्धोपरागान्नव्यवस्था ॥ २६ ॥ जब आत्मा और इन्द्रिय दोनों को विषय-वासना में बंधा हुआ मानोगे तो मुक्त और बन्धन में रहनेवाले का पता भी