भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १० ) अर्थ—यदि दोनों से पृथक् मानो तो यह दोष आजायगा । उ०—न तादृक्पदार्थप्रतीतेः ॥ २४ ॥ अर्थ—इस प्रकार अविद्या वस्तु अवस्तु से पृथक् नहीं हो सकती ; क्योंकि ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो सत् असत् से पृथक् हो और यहाँ यह भी प्रश्न उत्पन्न होता है कि तुम्हारी अविद्या के अनिर्वचनीय होने में कोई प्रमाण है या नहीं। यदि कहो प्रमाण है तो वह प्रमेय हो गई, फिर अनिर्वचनीय किस प्रकार हो सकती है। यदि कहो प्रमाण नहीं, तो उसके होने का क्या प्रमाण है ? प्र०—न वयं षट्पदार्थवादिनोवैशेषिकादिवत्॥ २५ अर्थ—हम षट् पदार्थों को वैशेषिक के सदृश नहीं मानते और न्याय के समान सोलह भी नहीं मानते हैं। इस कारण हमारे मत में सत् असत् से अविद्या विलक्षण होना ठीक है और वही बन्ध का हेतु है। उ०—अनियतत्वेऽपि नायौक्तिकस्य संग्रहोऽ न्यथाबालोन्मत्तादिसमत्वम् ॥ २६ ॥ अर्थ—आप पदार्थों की संख्या का नियम मानें चाहे न मानें, परन्तु सत् असत् से पृथक् कोई पदार्थ बिना युक्ति के माननीय नहीं हो सकते। नहीं तो इस प्रकार बालक और उन्मत्त का कहना भी ठीक हो सकता है। जिस प्रकार बालक और उन्मत्त का कहना युक्तिशून्य होने से प्रामाणिक नहीं, इसी प्रकार तुम्हारा कहना भी असंगत है। प्र०—तो क्या जीव अनादि वासना से बन्धन में पड़ा है ? उ०—नानादिविषयोपरागनिमित्तकोऽप्यस्य॥२७

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