भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ६ ) है उसी का प्रकृति के साथ योग होता है और वह मिथ्याज्ञान के कारण बद्ध हो जाता है, जैसाकि आगे कथन होगा । प्र०—तो क्या अविद्या से ब्रह्म ही जीव हो गया है और इस दुःख की उत्पत्ति केवल अविद्या से है ? उ०—नाविद्यातोऽप्य वस्तुनोवन्धायोगात् ॥२०॥ अर्थ—अविद्या से जो कोई पदार्थ ही नहीं, बन्धन का होना सम्भव नहीं, क्योंकि आकाश के फूल की सुगन्धि किसी को भी नहीं आती। यदि मायावादी जो अविद्या, उपाधि से जीव को वन्धत मानते हैं अविद्या को वस्तु अर्थात् द्रव्य मानते हैं तो उनका सिद्धान्त उड़ जायगा जैसाकि लिखा है— उ०—वस्तुत्वे सिद्धान्तहानिः ॥ २१ ॥ अर्थ—यदि अविद्या को वस्तु मान लिया जावे तो उनको एक अद्वैत ब्रह्म के सिद्धान्त का खण्डन हो जायगा, क्योंकि एक वस्तु जो ब्रह्म है दूसरी अविद्या हो गई, इसलिये अद्वैत न रहा। प्र०—इसमें क्या दोष है ? उ०—विजातीयाद्वैतापत्तिश्च ॥ २२ ॥ अर्थ—अद्वैतवादी ब्रह्म को सजातीय अर्थात् बराबर जाति वाले, विजातीय विरुद्ध जातिवाले, स्वगत अपने भाग इत्यादि के भेद से रहित मानते हैं और यहाँ अविद्या के वस्तु मानने से विजाति अर्थात् दूसरी जाति का पदार्थ उपस्थित होने से अद्वैत सिद्धान्त का खण्डन हो गया । प्र०—हम अविद्या को वस्तु और अवस्तु दोनों से पृथक् अनिर्वचनीय पदार्थ मानते हैं, जैसे— विरुद्धोभय रूपा चेत् ॥ २३ ॥