सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ८ ) उ०—विचित्र भोगानुपपत्तिरन्यधर्म्मत्वे ॥ १७ अर्थ—यदि दुःख योग-रूप बन्धन केवल चित्त का धर्म माना जाय तो नाना प्रकार के भोग में संसार प्रवृत्त है, नहीं रहना चाहिये, क्योंकि जीव को दुःख होने के बिना हो यदि दुःख का अनुभवकर्त्ता माना जाय तो सारे मनुष्य दुःखी हो जायेंगे; क्योंकि जिस प्रकार दुःख का सम्बन्ध न होने से जैसे दुःखी प्रतीत होता है ऐसे ही दुःख के न होने पर सब दुःखी लोग हो सकते हैं, अतएव कोई दुःखी या कोई सुखी इस प्रकार अन्य प्रकार का भोग नहीं हो सकेगा। प्र०—क्या प्रकृति के संयोग से दुःख होता है ? उ०—प्रकृतिनिबन्धनाच्चेन्नत्तस्या अपि पार- तन्त्र्यम् ॥ १८ ॥ अर्थ—यदि बन्धन का कारण प्रकृति मानो तो प्रकृति स्वयं ही स्वतन्त्र नहीं, तो परतन्त्र प्रकृति किसी को किस प्रकार बाँध सकती है; क्योंकि जबतक प्रकृति का संयोग न हो तबतक वह किसी को बाँध ही नहीं सकती और संयोग दूसरे के अधि- कार में है। प्र०—क्या ब्रह्म ही उपाधि से जीव-रूप होकर अपने आप बँध गया है ? उ०—न नित्यशुद्ध मुक्तस्वभावस्य तद्योगस्तद्यो- गाहते ॥ १९ ॥ अर्थ—जो ईश्वर नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव है, उसका तो प्रकृति के साथ सदैव सम्बन्ध है, इसलिये वह जीव-रूप होकर दुःख नहीं पा सकता, क्योंकि उसके गुण एक रस हैं, इस कारण ब्रह्म को उपाधिकृत बन्धन नहीं, वरन् जीव अल्पज्ञ, नित्य पदार्थ