सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ७ ) और सुषुप्ति या बाल्यावस्था या युवावस्था या वृद्धावस्था इन छः दशाओं में किसके हेतु से दुःख और बन्धन होता है ? उ०—नावस्थातो देहधर्म्मत्वात् तस्याः ॥ १४ ॥ अर्थ—इन दशाओं से भी दुःख उत्पन्न नहीं हो सकता, क्योंकि बाल, युवा और वृद्धावस्था शरीर के धर्म हैं। यदि अन्य के धर्म से अन्य का बन्धन माना जाय तो सर्वथा अन्याय है; क्योंकि किसी दूसरे बन्धनयुक्त मनुष्य के धर्म से कोई मुक्त बन्धन में पड़ जायगा और मुक्त के धर्म से कोई बद्ध मुक्त होजायगा । प्र०—क्या इन अवस्थाओं से जीव का कोई सम्बन्ध नहीं, ये केवल शरीर की हैं ? उ०—असङ्गोऽयं पुरुष इति ॥ १५ ॥ अर्थ—यह जीव सर्वथा असङ्ग है, इसका बाल्य, वृद्ध और युवावस्था से किञ्चित् सम्बन्ध नहीं । प्र०—तो क्या दुःख अर्थात् बन्धन के उत्पन्न होने का हेतु कर्म है ? उ०—न कर्म्माण्यधर्म्मत्वादतिप्रसक्तेश्च ॥ १६ ॥ अर्थ—वेदविहित या निषिद्ध कर्मों से जीव का बन्धन-रूपी दुःख उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि कर्म करना भी शरीर वा चित्त का धर्म है। द्वितीय कर्म शरीर से होगा और शरीर कर्म के फल से होता है, तो अनवस्था दोष उपस्थित हो जायगा । तीसरे यदि शरीर का कर्म आत्मा के बन्धन का हेतु माना जावे तो बन्धन में हुये जीव के कर्म से मुक्त-जीव का बन्धन होना सम्भव हो सकता है, अतएव कर्म द्वारा बन्धन उत्पन्न नहीं होता। प्र०—तो हम दुःखरूप बन्धन भी चित्त को ही मान लेंगे, उस दशा में चित्त के कर्म द्वारा चित्त को बन्धन होने से कोई दोष नहीं रहेगा ?