सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १४४ ) स्त्री का पुत्र । जबकि वन्ध्या स्त्री के पुत्र होता ही नहीं तो ऐसा कहना भी व्यर्थ है। यदि इस तरह वेदों का भी कुछ अर्थ न होता तो वृद्ध लोग परम्परा से (एक को एकने पढ़ाया ) क्यों शिष्यों को पढ़ा कर प्रसिद्ध करते । इससे प्रत्यक्ष होता है कि वेदों का अर्थ है । न सतोबाधदर्शनात् ॥ ५३ ॥ अर्थ—जो पदार्थ सत् है उसका बाध किसी तरह नहीं हो सकता और वेद सत् माने गये हैं, इसवास्ते ऐसा कहना नहीं बन सकता कि वेदार्थ नहीं है । प्र०-वेदार्थ है या नहीं, ऐसा झगड़ा क्यों किया जाय, यही न कह दिया जावे, कि वेद का अर्थ है तो, परन्तु अनिर्वचनीय है। नानिर्वचनीयस्य तदभावात् ॥ ५४ ॥ अर्थ—वेद के अर्थ को अनिर्वचनीय ( जो कहने में न आव ) कहना ठीक नहीं, क्योंकि संसार में ऐसा कोई पदार्थ नहीं दीखता जो अनिर्वचनीय हो, और उसी पदार्थ को कह सकते हैं, जो संसार में प्रत्यक्ष है; इसलिये अनिर्वचनीय कहना ठीक नहीं है । नान्यथाख्यातिः स्ववचोव्याघातात् ॥ ५५ ॥ अर्थ—अन्यथा ख्याति भी नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा कहने पर अपने ही कथन में दोष प्राप्त होता है । इस सूत्र का अभिप्राय यह है, कि वेद का अर्थ दूसरा है, परन्तु संसार में दूसरी तरह प्रचलित हो रहा है, इस तरह की अन्यथा ख्याति करने पर यह दोष होता है, कि जो मनुष्य वेद का अर्थ ही न मान कर अनिर्वचनीय कहते हैं, वह न्याय अख्याति को क्यों मान सकते हैं, ऐसा कहना उनके वचन से ही विरुद्ध होगा ।