सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १४५ ) प्र०—अन्यथा ख्याति किसको कहते हैं ? उ०—पदार्थ तो दूसरा हो, और अर्थ दूसरी तरह किया जाय, जैसे—सीप में चाँदी का आरोप करना अर्थात् चाँदी सिद्ध करनी । सदसत्ख्यातिर्बाधाबाधात् ॥ ५६ ॥ अर्थ—यह ऐसा माना जाय, कि वेदों का अर्थ है भी और नहीं भी है, क्योंकि जो संसार के कार्यों में चतुर नहीं हैं उन- को वेद के अर्थ का बाध होता है ; और जो सांसारिक कार्यों में चतुर हैं, उनको अबाध होता है, इस तरह स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, है या नहीं, इस तरह जैनों के मत के अनुसार ही माना जाय, तो भी ठीक नहीं। इस सूत्र में पहिले सूत्र से नकार अनुवृत्ति आती है। “नासत:ख्यातं न शृंगवत्” इस सूत्र से लेकर ५६ वें सूत्र तक जो अर्थ विज्ञानभिक्षु ने किया है, और “गुणादीनां नात्यन्तबाध:”, इस सूत्र के आशय से मिलाया है, वह ठीक नहीं ; क्योंकि वैसा अर्थ करने से प्रसंग में विरोध आता है। दूसरे यह कि इस ५६वें सूत्र को, जो कपिल मुनि के सिद्धान्त पक्ष में रखकर गुणों का बाध, अबाध दोनों ही माने हैं, वह भी ठीक नहीं, क्योंकि “न तादृक् पदार्थाप्रतीते:”, इस सूत्र में आचार्य पहिले ही कह चुके हैं, कि असत् और सत् इन दोनों धर्म्मों वाला कोई पदार्थ संसार में नहीं दीखता, तो क्या आचार्य भी विज्ञानभिक्षु के समान ज्ञान-रहित थे, जो अपने पूर्वापर कथन को ध्यान में न रख कर गुणों को सत् और असत् दोनों रूपों से कहते। यहां तक वेदों की उत्पत्ति और नित्यता को सिद्ध कर चुके। अब शब्द के सम्बन्ध में विचार करते हैं। प्रतीत्यप्रतीतिभ्यां न स्फोटात्मक: शब्द: ॥५७॥ अर्थ—जो शब्द मुख से निकलता है, उस शब्द के अतिरिक्त जो उस शब्द में अर्थ के ज्ञान कराने वाली शक्ति है, उसे स्फोट