भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १४६ ) कहते हैं ; जैसे कि—किसी ने कलश शब्द को कहा, तो उस कलश शब्द के उच्चारण होने से कम्बुग्रीवादि कपालों का जिस शक्ति से ज्ञान होता है, उसका ही नाम स्फोट है। इससे ऐसा न समझना चाहिये, कि कलश इतना शब्द मुँह से निकलते ही कम्बुग्रीव वाला जो पदार्थ है, उसका ही नाम कलश है, किन्तु जिस शक्ति से उसका ज्ञान होता है, उसी का नाम स्फोट कह- लाता है, किन्तु स्फोटात्मक शब्द नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें दो तरह के तर्क उत्पन्न हो सकते हैं, कि शब्द की प्रतीति होती है या नहीं। यदि प्रतीति होती है, तो जिस अर्थ वाले अक्षर समुदाय से पूर्वापर मिला कर अर्थ प्रतीति और वाच्य ( कहने लायक ) वस्तु का बोध ( ज्ञान ) है, उसके सिवाय स्फोट को मानना व्यर्थ है, क्योंकि शब्द से ही अर्थ ज्ञान हुआ, स्फोट से नहीं। और यह कहो कि शब्द की प्रतीति नहीं होती, तब अर्थ ही नहीं। फिर स्फोट में ऐसी शक्ति कहां से आई जो बिना अर्थ के अर्थ की प्रतीति करा सकै। इस कारण स्फोट का मानना व्यर्थ है। प्र०—न शब्दनित्यत्वं कार्य्यताप्रतीतेः ॥ ५८ ॥ अर्थ—शब्द नित्य नहीं हो सकता, क्योंकि उच्चारण के बाद शब्द नष्ट हो जाता है ; जैसे—ककार उत्पन्न हुआ, उच्चा- रणावसान में फिर नष्ट हो गया, इत्यादि अनुभवों से सिद्ध होता है कि शब्द भी कार्य्य है। उ०—पूर्व्वसिद्ध सत्त्वस्याभि व्यक्तिर्दीपेनैव - घटस्य ॥ ५९ ॥ अर्थ—जिस शब्द का होना पहिले ही से सिद्ध है, उस शब्द का उच्चारण करने से प्रकाश होता है, उसकी उत्पत्ति