भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 192 में से

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( १४७ ) नहीं होती है । दृष्टान्त—जैसेकि अंधेरे स्थान में रक्खे हुये पात्र को दीपक प्रकाश कर देता है । ऐसा नहीं कह सकते कि दीये ने पात्र को उत्पन्न कर दिया, क्योंकि पात्र तो पहिले से ही वहाँ विद्यमान था, अंधकार के कारण उसका ज्ञान नहीं होता था। इसी तरह शब्द भी पहिले से सिद्ध है, उच्चारण करने से केवल उनका प्रकाश होता है, इसलिये शब्द नित्य है । सत्कार्यसिद्धांतश्चेत् सिद्धसाधनम् ॥ ६० ॥ अर्थ—यदि ऐसा कहा जाय, कि कार्य जिस अवस्था में दीखता है, उसी अवस्था में सत् है, शेष और अवस्थाओं में असत् है। इसी तरह शब्द का भी कार्य है, और अपनी अवस्था में सत् है, ऐसा मानेंगे, तो आचार्य कहते हैं, कि ऐसा मनने पर हम शब्द के सम्बन्ध में सिद्ध साधन मानेंगे, अर्थात् जो शब्द पहिले हृदय में था, उसीको उच्चारण आदि क्रियाओं से स्पष्ट किया है, किन्तु घटादि पदार्थों के समान बनाया नहीं है । यहाँ- तक शब्द-विचार समाप्त हुआ। अब इस विषय का विचार करेंगे कि जीव एक है, वा अनेक हैं। नाद्वैतमात्मनो लिंगात् तद्भेदप्रतीतेः ॥ ६१ ॥ अर्थ—जीव एक नहीं है, किन्तु अनेक हैं, इस सूत्र का यह भी अर्थ है। जीव और ईश्वर इन दोनों का अभेद मानकर जो अद्वैत माना जाता है वह ठीक नहीं, क्योंकि जीव के जो अल्पज्ञत्वादि चिह्न हैं, और ईश्वर के जो सर्वज्ञत्वादि चिन्ह हैं, - उनसे दोनों में भेद ज्ञात होता है । नानात्मनापि प्रत्यक्षबाधात् ॥ ६२ ॥ अर्थ—अनात्मा जो सुख दुःखादिकों के भोग हैं। उनसे भी यही बात सिद्ध होती है, कि जीव एक नहीं है, क्योंकि एक

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