भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १५२ ) अर्थ— यदि आकार के सम्बन्ध को छोड़ देना ही मुक्ति मानें तो भी ठीक नहीं, क्योंकि उसमें क्षणिकत्वादि दोष प्राप्त होते हैं। इस सूत्र का स्पष्टार्थ यह है—प्रकृति का आकार घड़ा है, उसका फूट जाना है उसको ही प्रकृति की मुक्ति मान लिया जाय सो यह कथन कुछ अच्छा नहीं है, क्योंकि क्षणिकत्वादि सैकड़ों दोष प्राप्त हो जायेंगे, ऐसा मानने से । जैसेकि कोई घड़ा इस क्षण में टूट गया और फिर इसी क्षण में दूसार बन गया तो इत्यादि कारणों से प्रधान की मुक्ति कैसे होसकती, है ? न सर्वोच्छित्तिः पुरुषार्थत्वादिदोषात् ॥ ७८ ॥ अर्थ—सबको छोड़ देना भी मोक्ष नहीं होसकता । यदि प्रधान सम्पूर्ण ( सब ) सृष्टि आदि रचना को छोड़ दे तो भी उसकी मुक्ति नहीं होसकती, क्योंकि प्रधान के सब कार्य पुरुष के लिये हैं । एवं शून्यमपि ॥ ७६ ॥ अर्थ—यदि सब को जोड़ देना ही प्रधान की मुक्ति का लक्षण मान भी लिया जाय तो वह मुक्ति शून्य रहेगी, क्योंकि आनन्द न रहेगा तो व्यर्थ है, इसलिये ऐसा न साना जाय । प्र०—पुरुष के साथ रहने वाली प्रकृति किसी स्थान में पुरुष को छोड़ दे, इसको ही मुक्ति क्यों न माना जाय ? उ०—संयोगाश्च वियोगान्ता इति न देशादि- लाभोऽपि ॥ ८० ॥ अर्थ—जिसका संयोग होता है उसका वियोग तो निश्चय ही होगा फिर किसी स्थान में जाकर छोड़ा तो क्या मुक्ति हो सकती है ? किसी सूरत में नहीं । इसी तरह जब प्रकृति और पुरुष का संयोग है तो वियोग भी जरूर होगा, फिर उसमें देश