सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १५२ ) की क्या ज़रूरत है, क्योंकि स्थान के प्राप्त होने से मुक्ति तो हो ही नहीं सकती । नभागियोगो भागस्य ॥ ८१ ॥ अर्थ-प्रधान के भाग ( अंश ) जो महत्तत्वादिक हैं उन- का भागी ( प्रधान ) में मिल जाना ही मुक्ति है, सो भी नहीं हो सकता, क्योंकि वह तो उसमें मिलते ही हैं । नाणिमादियोगोऽप्यवश्यंभावित्वात् तदुच्छिते- रितरयोगवत् ॥ ८२ ॥ अर्थ-पुरुष के योग से अणिमादि ऐश्वर्य्यों का योग होना भी प्रधान की मुक्ति का लक्षण नहीं हो सकता, क्योंकि जिसका योग है उसका वियोग तो अवश्य ही होगा, जैसाकि दूसरे पदार्थों में मालूम होता है । नेन्द्रादिपदयोगोऽपितद्वत् ॥ ८३ ॥ अर्थ-पुरुष के संयोग से इन्द्रादि पद की प्राप्ति का होना प्रधान की मुक्ति का लक्षण नहीं हो सकता, क्योंकि वह सब नाशवान् हैं । अब “अहङ्कारिकश्रुतेर्नभौतिकानि” इस सूत्र में जो वात सूक्ष्म रीति से कही है उसको कहते हैं- न भूतप्रकृतित्वमिन्द्रियाणामाहं कारिकत्व- श्रुतेः ॥ ८४ ॥ अर्थ-जो बात पृथिवी आदि भूतों में विद्यमान है वह बात इन्द्रियों में नहीं दीखती, इसवास्ते इन्द्रियों को भौतिक नहीं कह सकते, किन्तु अहङ्कार से पैदा हुई हैं । प्र०-सांख्य के मत के अनुसार प्रकृति और पुरुष का ज्ञान होना ही मुक्ति का हेतु है; किन्तु वैशेषिकादिकों ने जो छः पदार्थ माने हैं उनके ज्ञान से मुक्ति क्यों नहीं हो सकती ?