सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 155, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें( १५४ ) उ०- न षट्पदार्थनियमस्तद्बोधान्मुक्तिः ॥८५॥ अर्थ—पदार्थ छः ही हैं ऐसा कोई नियम नहीं; किन्तु पदार्थ असंख्य ( बेशुमार ) हैं । अभाव जानने के वास्ते असंख्य पदार्थ हैं, तो छः पदार्थों के जानने से मुक्ति नहीं हो सकती । षोडशादिष्वप्येवम् ॥ ८६ ॥ अर्थ—गौतमादिकों ने जो सोलह पदार्थ माने हैं और जिन- जिन महर्षियों ने पच्चीस पदार्थ माने हैं उनके जान लेने से भी मुक्ति नहीं हो सकती; क्योंकि पदार्थ तो असंख्य हैं। प्र०—वैशेषिकादिकों का मत क्यों दूषित माना गया है; क्योंकि वह वैशेषिकादिक पृथिवी आदि के अणुओं को नित्य मानते हैं। उ०—नाणुनित्यता तत्कार्यत्वश्रुतेः ॥ ८७ ॥ अर्थ—पृथिवी आदि के अणुओं की नित्यता किसी प्रकार प्राप्त नहीं हो सकती, क्योंकि श्रुतियाँ उनको कार्य रूप कहती हैं और एक युक्ति भी है। जब पृथिवी आदि साकार है तो उनके अणु भी साकार हो सकते हैं। जब साकारता प्राप्त हो गई तो किसी के कार्य भी जरूर हुए, इस कारण पृथिवी आदि के अणुओं को नित्य नहीं कह सकते। यहाँ अणु का अर्थ परमाणु नहीं, उससे स्थूल है। प्र०—आप अणुओं को नित्य नहीं मानते तो मत मानो; लेकिन उनका कोई कारण नहीं दीखता, इसवास्ते उनको कारण रहित मानना चाहिये ? उ०—न निर्भागत्वं कार्यत्वात् ॥ ८८ ॥ अर्थ—जबकि अणु कार्य है तो कारण रहित कैसे हो सकते