सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
( १५४ ) उ०- न षट्पदार्थनियमस्तद्बोधान्मुक्तिः ॥८५॥ अर्थ—पदार्थ छः ही हैं ऐसा कोई नियम नहीं; किन्तु पदार्थ असंख्य ( बेशुमार ) हैं । अभाव जानने के वास्ते असंख्य पदार्थ हैं, तो छः पदार्थों के जानने से मुक्ति नहीं हो सकती । षोडशादिष्वप्येवम् ॥ ८६ ॥ अर्थ—गौतमादिकों ने जो सोलह पदार्थ माने हैं और जिन- जिन महर्षियों ने पच्चीस पदार्थ माने हैं उनके जान लेने से भी मुक्ति नहीं हो सकती; क्योंकि पदार्थ तो असंख्य हैं। प्र०—वैशेषिकादिकों का मत क्यों दूषित माना गया है; क्योंकि वह वैशेषिकादिक पृथिवी आदि के अणुओं को नित्य मानते हैं। उ०—नाणुनित्यता तत्कार्यत्वश्रुतेः ॥ ८७ ॥ अर्थ—पृथिवी आदि के अणुओं की नित्यता किसी प्रकार प्राप्त नहीं हो सकती, क्योंकि श्रुतियाँ उनको कार्य रूप कहती हैं और एक युक्ति भी है। जब पृथिवी आदि साकार है तो उनके अणु भी साकार हो सकते हैं। जब साकारता प्राप्त हो गई तो किसी के कार्य भी जरूर हुए, इस कारण पृथिवी आदि के अणुओं को नित्य नहीं कह सकते। यहाँ अणु का अर्थ परमाणु नहीं, उससे स्थूल है। प्र०—आप अणुओं को नित्य नहीं मानते तो मत मानो; लेकिन उनका कोई कारण नहीं दीखता, इसवास्ते उनको कारण रहित मानना चाहिये ? उ०—न निर्भागत्वं कार्यत्वात् ॥ ८८ ॥ अर्थ—जबकि अणु कार्य है तो कारण रहित कैसे हो सकते
( १५५ ) हैं ? क्योंकि जो कार्ये है उसका कारण भी अवश्य ही कोई न कोई होगा । प्र०-जबकि प्रकृति और पुरुष दोनों ही आकार रहित हैं तो उनका प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है; क्योंकि जबतक रूप न होगा तबतक प्रत्यक्ष नहीं हो सकता ? उ०-न रूपनिबन्धनात् प्रत्यक्षनियमः ॥ ८६ ॥ अर्थ-रूप के बिना प्रत्यक्ष नहीं होता, कोई नियम नहीं है ; क्योंकि जो बाहर की वस्तु है उसके देखने के वास्ते अवश्यमेव इन्द्रिय से योग की आवश्यकता रहती है, लेकिन जो ज्ञान से जाना जाता है उसको रूपवान होने की कोई आवश्यकता नहीं है, और नास्तिक लोग जो यह बात कहते हैं कि साकार पदार्थ का ही प्रत्यक्ष होता है, निराकार का नहीं होता, यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि जब नेत्र आदि इन्द्रियों में दोष हो जाता है तब सामने रक्खे हुए घट-पटादि पदार्थों का भी प्रत्यक्ष नहीं होता । इस से साबित होता है कि पदार्थ का स्वरूप होना प्रत्यक्ष होने में नियम नहीं, किन्तु इन्द्रियों की स्वच्छता हेतु है । प्र०-आपने जो अणुओं को कार्य्यरूप कहकर अनित्य सिद्ध किया तो क्या अणु कोई वस्तु आपके मत में है या नहीं ? इसपर आचार्य्य अपना मत दिखाते हैं । उ०-न परिमाणचातुर्विध्यं द्वाभ्यां तद्योगात् ॥६० अर्थ-जो मनुष्य अणु, महत्, दीर्घ, ह्रस्व यह चार भेद मान- कर परिमाण चार तरह के मानते हैं ऐसा मानना ठीक नहीं है ; क्योंकि जिस बात के सिद्ध करने को चार प्रकार के परिमाण मानते हैं वह बात अणु और महत् इन दो तरह के परिमाणों से भी सिद्ध हो सकती है । दीर्घ और ह्रस्व यह दो परिमाण महत्
( १५६ ) परिमाण के अवान्तर ( भीतर रहने वाले ) भेद हैं। यदि गिनती बढ़ानी ही स्वीकार है तो एक तिरछा अणु, एक सीधा अणु, ऐसे ही बहुत से भेद हो सकते हैं ; लेकिन ऐसा होना ठीक नहीं। और हमने जो अणुओं को अनित्य प्रतिपादन किया था वह सिर्फ पृथ्वी आदि के गुण को अनित्य कहा था ; किन्तु अणु परिमाण द्रव्यों को अनित्य नहीं प्रतिपादन किया था, क्योंकि हम भी तो अणु नित्य मानते हैं। प्र०—जब प्रकृति और पुरुष के सिवाय सबको अनित्य कहा तो प्रत्यभिज्ञा किस तरह हो सकती है, क्योंकि जब सब पदार्थों को नाशवान् मान लेंगे तब प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती है। प्रत्यभिज्ञा का लक्षण पहले अध्याय में कह आये हैं। उ०—अनित्यत्वेऽपि स्थिरतायोगात् प्रत्य- भिज्ञानं सामान्यस्य ॥ ६१ ॥ अर्थ—यद्यपि प्रकृति और पुरुष के सिवाय जितने सामान्य पदार्थ हैं वे सब ही अनित्य हैं तथापि हम उनको स्थिर मानते हैं ; लेकिन क्षणिकवादियों के समान हर एक क्षण में परिवर्त्तन- शील ( लौटना अर्थात् उलट-फेर ) नहीं मानते हैं ; इसवास्ते प्रत्यभिज्ञा हो सकती है। न तदपलापस्त स्मात् ॥ ६२ ॥ अर्थ—अतएव सामान्य पदार्थ कुछ न रहा ऐसा नहीं कहा जा सकता ; किन्तु ऐसा कहा जा सकता है कि सामान्य पदार्थ नित्य नहीं है। नान्यनिवृत्तिरूपत्वं भाव प्रतीतेः ॥ ६३ ॥ अर्थ—सामान्य पदार्थों को अनित्य नहीं कह सकते हैं,
सूत्र कहा गया है, कि सामान्य पदार्थ किसी प्रकार अनित्य नहीं
( १५७ ) क्योंकि उनकी विद्यमानता दीखती है। आशय यह है, कि जब आचार्य प्रकृति और पुरुष के सिवाय सबको अनित्य मानते हैं तो प्रत्यभिज्ञा कैसे होगी ? इस शङ्का को दूर करने के वास्ते यह सूत्र कहा गया है, कि सामान्य पदार्थ किसी प्रकार अनित्य नहीं हो सकते हैं; क्योंकि वे भी दीखते हैं। प्र०—प्रत्यभिज्ञा के वास्ते जो सामान्य पदार्थों को स्थिर माना गया है उनको स्थिर मानने की क्या ज़रूरत है ? क्योंकि जिस पदार्थ में प्रतिभिज्ञा होती है, उस तरह के दूसरे पदार्थ में भी प्रतिभिज्ञा हो सकती है; जैसे—किसी वक्त में घड़े को देखा था कुछ दिनों बाद उसी सूरत का एक घड़ा और देखा उसमें भी यही बात घट सकती है, कि जो घड़ा पहले देखा था वोही यह है, क्योंकि घड़े तो दोनों एक ही सूरत के हैं ? उ०—न तत्त्वान्तरं सादृश्यं प्रत्यक्षोपलब्धेः॥६४ अर्थ—एक घड़े के समान दूसरा घड़ा प्रत्यभिज्ञा का कारण नहीं हो सकता; क्योंकि यह बात तो प्रत्यक्ष ही से दीखती है, कि जो घड़ा पहिले देखा था उसमें, और जो अब देखा है इसमें फ़र्क़ है। इसलिये सदृश ( समान ) पदार्थ प्रत्यभिज्ञा का कारण नहीं है, इस कारण सामान्य पदार्थ और उनकी स्थिरता माननी पड़ेगी। प्र०—जो शक्ति पहिले देखे हुये घड़े में है वही शक्ति इस समय दीखते हुये घड़े में है। उस शक्ति के ही प्रकाश होने से प्रत्यभिज्ञा क्यों न मानी जाय। क्योंकि सब घड़े एक ही शक्तिवाले होते हैं, इसवास्ते दूसरे घड़े के देखने से प्रतिभिज्ञा को मानना ही चाहिये ? उ०—निजशक्त्यभिव्यक्तिर्वा वैशिष्ट्यात् तदुपलब्धेः ॥ ६५ ॥
( १५८ ) अर्थ—घटादि पदार्थों की शक्ति का प्रकाश होना प्रत्यभिज्ञा में हेतु नहीं हो सकता; क्योंकि यह बात तो अर्थापत्ति से सिद्ध है। यदि सब घड़ों में समान ( बराबर ) शक्ति न होती तो उन- का घड़ा नाम क्यों होता ? इसवास्ते समान आकृति और समान शक्ति प्रत्यभिज्ञा का हेतु नहीं हो सकती; किन्तु वही पदार्थ जो पहिले देखा है दूसरी बार के देखने से प्रत्यभिज्ञा का हेतु हो सकता है। इस बात से सिद्ध हो गया कि सामान्य पदार्थ अनित्य होने पर भी स्थिर है और इसी से प्रत्यभिज्ञा भी होती है। प्र०—एक घड़े में जो संज्ञा ( नाम ) संज्ञी ( नाम वाला ) सम्बन्ध है वही सम्बन्ध दूसरे घड़े में भी है फिर उसमें प्रत्य- भिज्ञा क्यों नहीं होती ? उ०—न संज्ञासंज्ञिसम्बन्धोऽपि ॥ ६६ ॥ अर्थ—संज्ञा-संज्ञी का सम्बन्ध भी प्रत्यभिज्ञा में हेतु नहीं हो सकता, क्योंकि ये भी अर्थापत्ति से जाना जा सकता है कि संज्ञा- संज्ञि सम्बन्ध सब घड़ों में बराबर है; परन्तु इतने पर भी अनेक घड़ों में अनेक भेद रहते हैं, इस कारण प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती, और संज्ञासंज्ञि सम्बन्ध होने पर भी दूसरा पदार्थ प्रत्यभिज्ञा का हेतु नहीं हो सकता, क्योंकि— न सम्बन्धनित्यतोभयानित्यत्वात् ॥ ६७ ॥ अर्थ—घटादि पदार्थों का सम्बन्ध नित्य नहीं है; क्योंकि संज्ञा और संज्ञी यह दोनों अनित्य हैं। तात्पर्य यह है कि जो घड़ा घट नाम से पुकारा जाता है उस घड़े के नाश होते ही उसकी संज्ञा का भी नाश हो जाता है, क्योंकि उस घड़े के टूटने पर उस को फिर घड़ा नहीं कह सकते हैं किन्तु कपाल ( ठीकरा ) कह सकते हैं। जबकि फिर दूसरा घड़ा नजर आया तो उसकी दूसरी
( १५६ ) घट संज्ञा हुई। दूसरी घट संज्ञा के होने से समता कहां रही, जब समता ही नहीं है तो प्रत्यभिज्ञा कैसी ? क्योंकि वह प्रत्य- भिज्ञा उसी पदार्थ में होती है जिसको कभी पहिले देखा हो, और जो घड़ा पहिले देखा था उसका तो नाश होगया, जिसको अब देख रहे हैं वह दूसरा है, तो वह पहिले देखा हुआ नहीं हो सकता, इसी से प्रत्यभिज्ञा भी नहीं हो सकती। प्र०—सम्बन्धी अनित्य हो परन्तु सम्बन्ध तो नित्य ही मानना चाहिये ? उ०—नातः सम्बन्धो धर्मिग्राहकमानबाधात्॥६८ अर्थ—जबकि संज्ञा-संज्ञी दोनों ही अनित्य सिद्ध हुये तो उनका संबन्ध कैसे नित्य हो सकता है ? क्योंकि संबन्ध जिन प्रमाणों से सिद्ध होता है उनसे ऐसा कहना नहीं बन सकता कि सम्बन्धी चाहे अनित्य हो पर सम्बन्ध को नित्य मानना चाहिये। उत्तर यह है कि यह बात किसी प्रकार ठीक नहीं हो सकती कि सम्बन्धी तो अनित्य हो और सम्बन्ध नित्य हो। प्र०—गुण और गुणी का नित्य समवाय सम्बन्ध शास्त्रों से सुना जाता है और वास्तव में वे दोनों अनित्य हैं, यह कैसे ठीक होसकता है ? उ०—न समवायोऽस्ति प्रमाणाभावात् ॥६६॥ अर्थ—समवाय कोई सम्बन्ध नहीं है प्रमाण के न होने से। उभयत्राप्यन्यथासिद्धेर्न प्रत्यक्षमनुमानं वा ॥१०० अर्थ—घड़ा मिट्टी से बना है व बना होगा, इन दोनों तरह के ज्ञानों में अन्यथा सिद्धि है, इसवास्ते समवाय को मानने की कोई ज़रूरत नहीं। इस सूत्र का स्पष्ट भाव यह है कि घट का उपादान कारण मिट्टी है और यह बात प्रत्यक्ष दीखती है कि मिट्टी से ही
( १६० ) घड़ा बनता है और अनुमान भी किया जाता है । इस प्रकार यह भी उक्त ( कहे हुये ) प्रमाणों से सिद्ध ( साबित ) हुआ कि बिना मिट्टी के घड़ा नहीं बन सकता है, इसलिये घट और मिट्टी का सम्बन्ध हुआ, लेकिन समवाय कोई सम्बन्ध नहीं है। प्र०—यदि समवाय सम्बन्ध न माना जाय तो दो कपालों का संयोग ( मेल ) घट की उत्पत्ति में हेतु होता है, उसको क्या कहेंगे और इस बात को कैसे जानेंगे कि दो कपालों का संयोग घट की उत्पत्ति में हेतु है । जिन दो अवयवों ( टुकड़ों के ) मिलने से घड़ा बनता है उसको कपाल कहते हैं ? उ०—नानुमेयत्वमेव क्रियया नेदिष्ठस्य तत्तद्रूमो रेष्वपरोक्षप्रतीतेः ॥१०१॥ अर्थ—क्रिया और क्रिया वाले का संयोग होकर घट बनता है, इस बात के जानने के लिये अनुमान की कोई आवश्यकता नहीं है ; क्योंकि धोरे रहनेवाले कुम्हार की प्रत्यक्ष क्रिया को देख कर ही जान लेते हैं कि दो कपालों के मिलने से घट बनता है, इसलिये जबतक वह घड़ा मौजूद रहेगा तबतक सम्बन्ध भी जरूर रहेगा ; इसके लिये समवाय सम्बन्ध के मानने की कोई ज़रूरत नहीं है। दूसरे अध्याय में यह मतभेद कह चुके हैं कि शरीर पंचभौतिक है । अब उन मतों की सत्यासत्यता दिखाते हैं कि वे मत सच्चे हैं या झूठे । न पांचभौतिकं शरीरं बहूनामुपादाना- योगात् ॥१०२॥ अर्थ—शरीर पंचभौतिक नहीं है अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश से शरीर की उत्पत्ति नहीं है, क्योंकि बहुत से पदार्थ एक पदार्थ के उपादान कारण ( जो जिससे बने, जैसे
( १६१ ) मिट्टी से घड़ा बनता है ) नहीं हो सकते; इस कारण शरीर को सिर्फ पार्थिव ( पृथ्वी से बना हुआ ) ही मानना चाहिये, और जो अग्नि आदि चार भूत इसमें कहे जाते हैं वे सिर्फ नाम- मात्र को ही हैं । कोई-कोई स्थूल शरीर को ही मानते हैं उसका भी खंडन करते हैं । न स्थूलमिति नियम आतिवाहिकस्यापि विद्यमानत्वात् ॥१०३॥ अर्थ—स्थूल शरीर ही है, ऐसा कोई नियम भी नहीं है, क्योंकि आतिवाहिक अर्थात् लिंग शरीर भी मौजूद है । यदि लिंग शरीर को न माना जाय तो स्थूल शरीर में गमनादि क्रिया ही नहीं हो सकती । इस बात को तीसरे अध्याय में विस्तार-पूर्वक कह आये हैं, जैसे—तेल बत्ती रूप से उत्पन्न हुई दीप की शिखा सम्पूर्ण ( सब ) घर का प्रकाश कर देती है, इसी तरह लिंग शरीर भी स्थूल शरीर को अनेक व्यापारों में लगाता है, और इस बात को भी पहले कह आये हैं कि इंद्रियाँ गोलकों से अतिरिक्त हैं, इसके साबित करने को ही इंद्रियों की शक्ति कहते हैं । नाप्राप्त प्रकाशकत्वमिन्द्रियाणाम प्राप्तेः सर्व- प्राप्तेर्वा ॥ १०४ ॥ अर्थ—जिस पदार्थ का इन्द्रियों से कोई भी सम्बन्ध नहीं है उसको इन्द्रियाँ प्रकाश नहीं कर सकतीं । यदि कर्म करती हैं तो देशान्तर ( दूसरी जगह ) में रक्खी कोई वस्तु का भी प्रकाश करना सिद्ध हो जायगा ; परन्तु ऐसी बात न तो नेत्रों से देखी और न कानों से सुनी । इस सूत्र का स्पष्ट भाव यह है कि इन्द्रियाँ उसी पदार्थ को प्रकाश कर सकती हैं जिससे उनका
( १६२ ) संबंध होता है, सम्बन्ध रहित के प्रकाश करने में उनकी शक्ति नहीं है। यदि इन्द्रियों में यह शक्ति होती कि बिना सम्बन्ध वाले पदार्थ को भी प्रकाश कर दिया करतीं तो देशान्तर के पदार्थ का भी प्रकाश करना कुछ मुश्किल न होता। और जब दूसरी जगह रक्खे हुए पदार्थों का नेत्र आदि इन्द्रियों को ज्ञान हो जाया करता कि वह वस्तु अमुक स्थान में रक्खी है तो उनको सर्वज्ञता प्राप्त हो सकती है ; इसलिये ईश्वर और इन्द्रियों में कुछ भेद नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्वर भी सर्वज्ञ है और इन्द्रियाँ भी सर्वज्ञ हैं, ऐसा ही कहने में आवेगा। इस कारण यही बात माननी ठीक है कि नेत्र आदि इन्द्रियाँ उस वस्तु का ही प्रकाश कर सकती हैं जो उनको दीखती हैं। प्र०—अपसर्पण ( फैलाना ) तेज का धर्म है और तेज पदार्थ का प्रकाश करता है। इसी तरह नेत्र को भी तेजस्वरूप मानना चाहिये ; क्योंकि वह नेत्र भी पदार्थ का प्रकाश करता है। उ०—न तेजोऽपसर्पणात् तैजसं चक्षुर्वृत्ति- तस्तत्सिद्धेः ॥ १०५ ॥ अर्थ—निस्सन्देह तेज में फैलने की शक्ति है, परन्तु इससे चक्षु ( आँख ) को तेजस्वरूप नहीं कह सकते ; क्योंकि जिस बात के सिद्ध करने के लिये नेत्र को तेजस्वरूप मानने की ज़रूरत है वह बात इस रीति से भी सिद्ध हो सकती है कि जो नेत्र की वृत्ति है ( जिससे कि पदार्थ का प्रत्यक्ष होता है ) उसी से पदार्थ का प्रत्यक्ष माना जाय। प्राप्तार्थप्रकाशलिंगात् वृत्तिसिद्धिः ॥ १०६ ॥ अर्थ—नेत्र का जिस पदार्थ से संबंध होता है उसको ही
( १६३ ) प्रकाश करता है, इससे साफ़-साफ़ सिद्ध होता है कि चक्षु की वृत्ति तेजस्वरूप है नेत्र तेजस्वरूप नहीं हैं। प्र०-जब नेत्र का पदार्थ से संबंध होता है तब नेत्र की वृत्ति शरीर को बिना छोड़े उस पदार्थ पर कैसे जा पड़ती है ? उ०-भागगुणाभ्यां तत्वान्तरं वृत्तिः सस्बं- धार्थ सर्पतीति ॥ १०७ ॥ अर्थ-नेत्र आदि की वृत्ति पदार्थ के सम्बन्ध के वास्ते जाती है, इससे नेत्र का ( भाग ) टुकड़ा वा रूप आदि गुण वृत्ति नहीं हैं; किंतु भाग और गुण इन दोनों से भिन्न ( जुदा ) एक तीसरे पदार्थ का नाम वृत्ति है; क्योंकि यदि चक्षु आदि के भाग का नाम वृत्ति होता तो एक-एक पदार्थ का एक-एक वार नेत्र से सम्बन्ध होने पर सहज-सहज नेत्र के टुकड़े होकर उसका नाश हो जाना योग्य था, और यदि गुण का हो नाम वृत्ति होता तो गुण जड़ होते हैं, इस वास्ते वृत्ति का पदार्थ के साथ सम्बन्ध होते ही पदार्थ में चला जाना नहीं हो सकता था ! अतः भाग और गुण इन दोनों से वृत्ति भिन्न एक पदार्थ है। प्र०-ऐसे लक्षणों के करने से वृत्ति एक द्रव्य सिद्ध होता है तब इच्छा आदि जो बुद्धि के गुण हैं उनको वृत्ति क्यों माना है ? क्योंकि गुणों का नाम वृत्ति नहीं हो सकता । उ०-न द्रव्यनियमस्तद्योगात् ॥ १०८ ॥ अर्थ-वृत्ति द्रव्य ही है, यह नियम नहीं; क्योंकि अनेक वाक्यों में ऐसे विषय पर भी वृत्ति शब्द का व्यवहार देखने में आता है जहाँ पर द्रव्य का अर्थ नहीं हो सकता ; जैसे-वैश्य वृत्ति, शूद्र वृत्ति इत्यादि । अतः हमने जिस विषय पर वृत्ति को
( १६४ ) द्रव्य माना है उसी विषय पर द्रव्य है, और जगह जैसा अर्थ हो वैसा ही करना चाहिये । इस बात को भी पहिले कह चुके हैं कि पाँच भौतिक शरीर सिर्फ़ नाममात्र ही हैं वास्तव में तो पार्थिव हैं । अब इस बात का विचार किया जाता है कि जिन इन्द्रियों के आश्रय से शरीर है वे इन्द्रियां जैसे कि हम लोगों की अहंकार से पैदा हैं वैसे ही और देशों के मनुष्यों की भी अहंकार से ही पैदा होती हैं, पंचभूत से नहीं पैदा होतीं । न देशभेदेऽप्यन्योपादानतास्मदा दिवन्नि- यमः ॥ १०६ ॥ अर्थ—देश के भेद होने पर भी वस्तु का दूसरा उपादान नहीं हो सकता, क्योंकि जैसे हम लोग और देशों में जाकर वास करने लगते हैं, परन्तु इन्द्रियां नहीं बदलतीं वे ज्यों की त्यों रहती हैं, हमारा देश ही तो पलट जाता है । यदि देश-भेद ही इन्द्रियों के बदलने में वा और उपादान कारण करने में हेतु होता है तो हम लोंगों की इन्द्रियां भी वहां जाकर जरूर बदल जातीं, लेकिन ऐसा देखने में नहीं आता, इससे सिद्ध होता है कि इन्द्रियां पांचभौतिक नहीं, किन्तु अहंकार से पैदा हैं । प्र०—जबकि इन्द्रियों की अहंकार से उत्पत्ति है तो उनको भौतिक क्यों प्रतिपादन किया है ? उ०—निमित्तव्यपदेशात् तद्व्यपदेशः ॥ ११० ॥ अर्थ—इन्द्रियों का निमित्त जो अहंकार है उस से ही पञ्चभूतों में भी इन्द्रियों का कारणत्व स्थापन किया जाता है, जैसे—आग यद्यपि काष्ठादि रूप नहीं है तथापि उसको लकड़ी, आग इत्यादि रूपों से पुकारते हैं; इसी तरह इद्रियां भौतिक भी नहीं हैं, तौ भी उनको भौतिक कहते हैं ।
( १६५ ) प्र०—सृष्टि कितने प्रकार की है ? उ०—छः प्रकार की, देखो— ऊष्मजाण्डजजरायुजोद्भिज्जसांकल्पिक सांसि- द्धिकंचेति न नियमः ॥ १११ ॥ अर्थ—( १ ) ऊष्मज (जो पसीने से पैदा होते हैं, जैसे लीख आदि ) ; अण्डज ( जो अण्डे से पैदा होते हैं, जैसे मुर्गी आदि ); ( ३ ) जरायुज (जो झिल्ली से पैदा होते हैं, मनुष्य आदि); ( ४ ) उद्भिज (जो जमीन को फोड़कर पैदा होते हैं, पेड़ आदि) ; ( ५ ) सांकल्पिक ( जैसे सृष्टि के आदि में बिना माता-पिता के देवऋषि पैदा होते हैं ; ( ६ ) सांसिद्धिक ( जैसे खान में धातु बनते हैं ) । आचार्य ( कपिलजी ) ने यही छः प्रकार की सृष्टि मानी है ; लेकिन इन छः प्रकार के सिवाय और किसी तरह की सृष्टि नहीं है, ऐसा नियम भी नहीं ; क्योंकि शायद किसी दशा में भूतों की सृष्टि इनसे अन्य प्रकार की हो । आचार्य के निश्चय ( तहक़ी- क़ात से तो छः ही प्रकार की सृष्टि देखने में आती है । सर्वेषु पृथिव्युपादानमसाधारणत्वात् तद्व्यप- देशः पूर्ववत् ॥ ११२ ॥ अर्थ—इन सब प्रकार की सृष्टियों का साधारण उपादान कारण पृथिवी है, इसलिये इनको पार्थिव कहना योग्य है, और जो पांचभूतों का व्यपदेश ( नाम ) सुना जाता है वह पूर्व- कथन ( पहिले कहा हुआ ) के समान समझना चाहिये अर्थात् मुख्य उपादान कारण पृथिवी है और सब गौण हैं । प्र०—इस शरीर में प्राण ही प्रधान (मुख्य ) है, इसलिये प्राण को ही देह का कर्त्ता मानना चाहिये ?
( १६६ ) उ०—न देहारम्भकस्य प्राणत्वमिन्द्रिय- शक्तितस्तत्सिद्धेः ॥ ११३ ॥ अर्थ—शरीर का कर्त्ता प्राण नहीं हो सकता, क्योंकि प्राण इन्द्रियों की शक्ति से अपने कार्य को करता है और इन्द्रियों के साथ प्राण का अन्वय व्यतिरेक दृष्टान्त भी हो सकता है, कि जब- तक इन्द्रियाँ हैं तब तक प्राण हैं, जब इन्द्रियों नाश होगईं तब प्राण भी नाश होगया, इसलिये प्राण को देह का कारण नहीं कह सकते । प्र०—जबकि शरीर के बनने में प्राण नहीं है तो बिना प्राण के भी शरीर की उत्पत्ति होनी चाहिये ? उ०—भोक्तुरधिष्ठानाद्भोगायतन निर्माणम- न्यथा पूर्ति'भावप्रसंगात् ॥ ११४ ॥ अर्थ—भोक्ता ( पुरुष ) के व्यापार से शरीर का बनना हो सकता है। यदि वह प्राणों को अपने-अपने स्थान न लगावै तो प्राण-वायु कभी भी ठीक-ठीक रसों को नहीं पका सकता। जब रस ठीक तरह से न पकेंगे तो शरीर में सैकड़ों तरह के रोग पैदा हो जायेंगे और दुर्गन्धि आने लगेगी। अतएव, यद्यपि प्राण कारण है लेकिन मुख्य कारण पुरुष को ही मानना चाहिये । प्र०—जो अधिष्ठानत्व ( बनानेवालापन ) पुरुष में माना जाता है वह अधिष्ठानत्व यदि प्राण में ही माना जावै तो क्या हानि है ? उ०—भृत्यद्वारा स्वाम्यधिष्ठितिर्नैकान्तात् ॥११५॥ अर्थ—इस प्रकार हम भी पुरुष को अधिष्ठाता मानते हैं। जैसे राजा अपने भृत्यों ( नौकरों ) के द्वाराsrc/मकानादिकों को बन-
( १६७ ) जाता है और वह मकानादि राजा के बनाये हुए हैं, इस प्रकार लोक में प्रसिद्ध होते हैं और उन मकानों का मालिक भी राजा ही है । इसी प्रकार पुरुष भी प्राण और इन्द्रियों के द्वारा शरीर को चलाता है, परन्तु अकेला आप नहीं चलाता और बिना उसके यह शरीर चल नहीं सकता, इससे वह अधिष्ठाता समझा जाता है । अब इस से आगे पुरुष का मुक्त दशा में स्वरूप आदि कहते हैं । समाधिसुषुप्तिमोक्षेषु ब्रह्मरूपता ॥ ११६ ॥ अर्थ—समाधि, सुषुप्ति और मोक्ष में पुरुष को ब्रह्मरूपता होजाती है अर्थात् जैसा ब्रह्म आनन्दस्वरूप है वैसे ही जीव भी आनन्दस्वरूप होजाता है । इस सूत्र का अर्थ और टीकाकारों ने ऐसा किया है कि समाधि, सुषुप्ति, मोक्ष, इन तीनों अवस्थाओं में जीव ब्रह्म हो जाता है, परन्तु ऐसा अर्थ करना ठीक नहीं है, क्योंकि रूप शब्द का सादृश्य अर्थ है, जैसा कि अमुक मनुष्य देव- स्वरूप है । इसके कहने से यह प्रयोजन सिद्ध होजाता है कि यह देव नहीं है, किन्तु देवताओं के-से उस में गुण हैं । ( विद्वांसोहि देवाः ) जो विद्वान है उनको ही देवता कहते हैं, इस बात को कह चुके हैं । इसी से उसको देवस्वरूप कहा गया । यदि देवता ही कहना स्वीकार होता तो अमुक मनुष्य देवता है इतना ही कहना योग्य था ; इसलिये इस कहे हुये सूत्र में भी ब्रह्मरूप कहने से यह प्रयोजन है कि जीव में ब्रह्म के-से कितने ही गुण इन अवस्थाओं में हो जाते हैं, परन्तु जीव ब्रह्म नहीं होजाता है । यदि आचार्य को भी यही बात स्वीकार होती कि उक्त जीव ब्रह्म हो जाता है तो ‘ब्रह्मरूपता’ न कहते, किंतु “ब्रह्मत्वम्” ऐसा कहते । जो ब्रह्म को और जीव को एक मानते हैं उनका मत इस ज्ञापक से दूषित हुआ ।
( १६८ ) प्र०-जब समाधि और सुषुप्ति में भी आनन्द प्राप्त होजाता है तो मुक्ति के लिये उपाय करने की क्या ज़रूरत है, और मुक्ति में अधिक कौनसी बात रही है ? उ०—द्वयोः सबीजमन्यत्र तद्धतिः ॥ ११७ ॥ अर्थ—समाधि और सुषुप्ति में जो आनन्द प्राप्त होता है वो थोड़े ही समय के लिये होता है और उसमें बन्ध भी बना रहता है । मोक्ष का आनन्द बहुत समय तक बना रहता और बंध का भी नाश हो जाता है, यह ही भेद समाधि और सुषुप्ति इन दो तरह के आनन्दों में और मोक्ष के आनन्द में है। प्र०-समाधि और सुषुप्ति यह दोनों प्रत्यक्ष दीखती है, परन्तु मोक्ष प्रत्यक्ष नहीं दीखता; इसलिये उसमें आनन्द न कहना चाहिये । उ०—द्वयोरिव त्रयस्यापि दृष्टत्वान्न तुह्रौ ॥११८ अर्थ—जैसे समाधि और सुषुप्ति यह दोनों प्रत्यक्ष दीखती , वैसे ही मोक्ष भी प्रत्यक्ष दीखता है । वह प्रत्यक्ष इस प्रकार होता है कि जबतक मनुष्य किसी कर्म को करके उसका फल नहीं भोग लेता है, तब तक उस कर्म के साधन करने के लिये उसकी नीयत नहीं होती ; जैसे—पहले भोजन कर चुके हैं तो दूसरे दिन भी भोजन करने के लिये उपाय किया जाता है। इसी तरह जब पहिले कभी जीव मोक्ष के सुख को जान चुका है तब फिर भी मोक्ष-सुख के लिये उपाय करने की नीयत होती है। यदि यह कहा जावै कि इस जन्म में जिस मनुष्य ने कभी राज्य-सुख नहीं भोगा है, परन्तु उसकी यह इच्छा रहती है कि राज्य का सुख प्राप्त हो । इसका यह उत्तर है कि राज्य में जो सुख होता है उस- को तो नेत्रों से देखते हैं । इससे यह साबित हुआ कि या तो मोक्ष
( १६६ ) का सुख कभी आप उठाया है अथवा किसी को मोक्ष से आनन्दित देखा है, इसलिये उसकी मोक्ष-सुख में नीयत होती है, यही प्रत्यक्ष प्रमाण है, और अनुमान से इस प्रकार मोक्ष को जान सकता है कि सुषुप्ति में जो आनन्द प्राप्त होता है उसको नाश करनेवाले चित्त के रागादि दोष हैं और वे रागादिक ज्ञान के अतिरिक्त और किसी प्रकार नाश नहीं हो सकते हैं। जब ज्ञान प्राप्त हो जायगा तब सुषुप्ति आदि सब अवस्थाओं की अपेक्षा जिसमें अधिक समय तक आनन्द की प्राप्ति हो, ऐसी अवस्था को मोक्ष कहते हैं । प्र०—समाधि में तो वैराग्य से कर्मों की वासना कमती हो जाती है, इस वास्ते समाधि में तो आनन्द प्राप्त हो सकता है ; परन्तु सुषुप्ति में वासना प्रबल होती है, तो पदार्थों का ज्ञान भी अवश्य होगा अर्थात् वासनायें अपने विषय की तरफ़ खींचकर उनमें जीव को लगा देंगी। जब पदार्थ का ज्ञान रहा तो आनन्द प्राप्ति कैसी ? उ०—वासनयानर्थख्यापनं दोषयोगेऽपि न निमित्तस्य प्रधानबाधकत्वम् ॥ ११६ ॥ अर्थ—जैसे वैराग्य में वासना कमती होकर अपना प्रभाव नहीं दिखा सकती, इसी तरह निद्रा-दोष के योग से भी वासना अपने विषय की ओर नहीं खींच सकती ; क्योंकि वासनाओं का निमित्त जो संस्कार है वह निद्रा के दोष से बाधित हो चुका है, इस वास्ते सुषुप्ति में भी समाधि की तरह आनन्द रहता है। पहले इस बात को कह चुके हैं कि संस्कार के लेश से जीवन्मुक्त शरीर बना सकता है । प्र०—जब संस्कार से शरीर बना रहता है वह एक ही संस्कार
( १७० ) उस जीव के प्राण धारणरूपी क्रिया को दूर कर देता है वा जुदी- जुदी क्रियाओं के वास्ते जुदे-जुदे संस्कार होते हैं ? उ०—एकः संस्कारः क्रियानिर्वर्तको नतु प्रतिक्रियं संस्कारभेदा बहुकल्पनाप्रसक्तेः ॥१२०॥ अर्थ—जिस संस्कार से शरीर का कार्य चल रहा है वह एक ही संस्कार निवृत्त होकर शारीरिक क्रियाओं को भी दूर कर देता है। हर एक क्रिया के वास्ते अलग-अलग संस्कार नहीं मानने चाहियें, क्योंकि बहुत से संस्कार हो जायेंगे और उन बहुत से संस्कारों का होना व्यर्थ है। प्र०—सुषुप्ति अवस्था में बाह्य पदार्थों का ज्ञान नहीं होता, इस कारण उस दशा में शरीर को भोगायतन मानना ठीक नहीं। उ०—न बाह्यबुद्धिनियमो वृक्षगुल्मलताौषधि- वनस्पतितृणवीरुधादीनामपि भोक्तृभोगायतनत्वं पूर्ववत् ॥१२१॥ अर्थ—जिसमें बाह्य बुद्धि होती है उसको शरीर कहते हैं, यह नियम भी नहीं है ; क्योंकि मृतक शरीर में बाह्य बुद्धि नहीं होती है तो क्या उसको शरीर नहीं कह सकते हैं। और वृक्ष, गुल्म, ओषधि, वनस्पति, तृण, वीरुध आदिकों में बहुत से जीव भोग के निमित्त रहते हैं और उनका बाहर के पदार्थों से कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता, यदि बाहर के पदार्थों के ज्ञान से ही शरीर माना जावे तो उनके शरीर को शरोर न मानना चाहिये। प्र०—क्या वृक्ष में जीव है कि नहीं ?
( १७१ ) उ०—वृक्ष में जीव नहीं है किंतु यहां वृक्ष में रहने वाले जीव से अभिप्राय है, क्योंकि गूलर आदि के फलों में जो जीव रहते हैं उनको बाहर के पदार्थों से कुछ सम्बन्ध नहीं होता। प्र०—यदि वृक्ष में जीव न हो तो वह बढ़ नहीं सकता ? उ०—बढ़ना, घटना जीव का धर्म नहीं प्रकृति का धर्म है ; क्योंकि संयोग से चीजें बढ़तीं और वियोग से घटती हैं, यहाँ तक कि पत्थर और पहाड़ भी बढ़ते हैं। प्र०—जिनमें जीव है वे अंदर से बढ़ते हैं और जिनमें नहीं वे बाहर से बढ़ते हैं। चूँकि वृक्ष अंदर से बढ़ते हैं इसवास्ते इनमें जीव मानना चाहिये ? उ०—यह कोई नियम नहीं कि जो अंदर से बढ़ते हैं उनमें अवश्य जीव हो, किन्तु जो चीज़ आग के सबब से बढ़ती है वह अन्दर से बढ़ती है, और जो पानी के सबब से बढ़ती है वह बाहर से बढ़ती है। प्र०—अंदर से बढ़ने वाली चीज़ नज़र नहीं आती ? उ०—चने जब उबाले जाते हैं तब अंदर से बढ़ते हैं, यहां- तक कि पहले से दूने बढ़ जाते हैं। प्र०—वृक्ष में जीव मानने से क्या सन्देह उत्पन्न होते हैं ? उ०—पहले तो यह सन्देह होगा कि एक वृक्ष में जितने फल हैं उन सब में एक जीव है या बहुत से जीव हैं। यदि कहो कि एक जीव है तो बीज के टूटने से उससे वृक्ष पैदा नहीं हो सकता और यदि बहुत जीव हैं तो एक शरीर के अभिमानी बहुत से जीव नहीं हो सकते। प्र०—जड़ पदार्थों के सदृश बाहरी ज्ञान से पृथक् हो जाता है उसमें क्या प्रमाण है ?
( १७२ ) उ०—स्मृतेश्च ॥ १२२ ॥ अर्थ—"शरीरजैः कर्म दोषैर्याति स्थावरतां नरः” शरीर से पैदा हुए कर्म के दोषों से मनुष्य स्थावर योनि को प्राप्त होता है, इस बात को स्मृतियां कहती हैं। इससे सिद्ध होता है कि स्थावर भी शरीर है ? प्र०—जब कि वृक्षादिकों को भी शरीरधारी मानते हो तो उनमें धर्माधर्म मानने चाहियें ? उ०—न देहमात्रतः कर्माधिकारित्वं वैशिष्ट्य- श्रुतेः ॥ १२३ ॥ अर्थ—देहधारी-मात्र को शुभाशुभ कर्मों का अधिकार नहीं दिया गया है, किन्तु श्रुतिओं ने मनुष्य जाति को ही धर्माधर्म का अधिकार प्रतिपादन किया है। देह के भेद से ही कर्म-भेद है, इस बात को आगे के सूत्र से सिद्ध करते हैं। त्रिधा त्रयाणां व्यवस्था कर्मदेहोपभोगदेहो- भयदेहाः ॥ १२४ ॥ अर्थ—उत्तम, मध्यम, अधम, इन तीन तरह के शरीरों की तीन व्यवस्था हैं और उनके वास्ते ही धर्म आदि अधिकार हैं। एक कर्म-देह जो सिर्फ कर्मों के करते-करते ही पूरा हो जाय, जैसे अनेक ऋषि-मुनियों का जन्म तप के करने ही में पूरा हो जाता है। दूसरा उपभोग-देह, जैसे अनेक पशु-पक्षि, कीटादि का शरीर कर्मफल भोगते-भोगते ही पूरा हो जाता है । तीसरा उभय-देह है, जिसने कर्म भी किये हों और भोग भी भोगे हों, जैसे सामान्य मनुष्यों का शरीर। केवल दो प्रकार के देहों के लिये कर्म की विधि है, भोग्य-योनि के वास्ते नहीं। मनुष्य के
( १७३ ) अतिरिक्त और सब उपभोग-देह अर्थात् भोग्य योनि हैं ; इसलिये उनको धर्म्माधर्म का विधान नहीं है । न किञ्चिदप्यनुशयिनः ॥ १२५ ॥ अर्थ—जो मुक्त हो गया है उसके वास्ते कोई भी विधान नहीं है, और न उसको किसी विशेष नाम से कह सकते हैं । प्र०—जीव को इस शास्त्र में नित्य माना है तो उस जीव के आश्रय में रहनेवाली बुद्धि को भी नित्य मानना चाहिये ? उ०—न बुद्ध्यादि नित्यत्वमाश्रय विशेषेऽपि- वहित् ॥ १२६ ॥ अर्थ—यद्यपि बुद्धियादि का आश्रय जीव नित्य है तो भी बुद्धि आदि नित्य नहीं हैं ; जैसे चंदन का काठ शीत प्रकृतिवाला होता है परन्तु आग के संयोग होने पर उसकी शीतलता आग में नहीं हो सकती । आश्रयासिद्धेश्च ॥ १२७ ॥ अर्थ—जीव बुद्धि का आश्रय हो ही नहीं सकता। इनका संबंध इस तरह है, जैसे स्फटिक और फूल का है ; इसवास्ते प्रतिविम्ब कहना चाहिये, आश्रय नहीं । इस विषय पर यह सन्देह होता है कि आचार्य योग की सिद्धियों को सच्ची मानते हैं और उनके द्वारा मुक्ति को भी मानते हैं ; परन्तु योग की ऐसी भी सैकड़ों सिद्धियाँ हैं जो समझ में नहीं आतीं । इस विषय पर आचार्य आप ही कहते हैं । योगसिद्धयोऽप्यौषधादि सिद्धिवन्नापलप- नीयाः ॥ १२८ ॥