भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १६६ ) का सुख कभी आप उठाया है अथवा किसी को मोक्ष से आनन्दित देखा है, इसलिये उसकी मोक्ष-सुख में नीयत होती है, यही प्रत्यक्ष प्रमाण है, और अनुमान से इस प्रकार मोक्ष को जान सकता है कि सुषुप्ति में जो आनन्द प्राप्त होता है उसको नाश करनेवाले चित्त के रागादि दोष हैं और वे रागादिक ज्ञान के अतिरिक्त और किसी प्रकार नाश नहीं हो सकते हैं। जब ज्ञान प्राप्त हो जायगा तब सुषुप्ति आदि सब अवस्थाओं की अपेक्षा जिसमें अधिक समय तक आनन्द की प्राप्ति हो, ऐसी अवस्था को मोक्ष कहते हैं । प्र०—समाधि में तो वैराग्य से कर्मों की वासना कमती हो जाती है, इस वास्ते समाधि में तो आनन्द प्राप्त हो सकता है ; परन्तु सुषुप्ति में वासना प्रबल होती है, तो पदार्थों का ज्ञान भी अवश्य होगा अर्थात् वासनायें अपने विषय की तरफ़ खींचकर उनमें जीव को लगा देंगी। जब पदार्थ का ज्ञान रहा तो आनन्द प्राप्ति कैसी ? उ०—वासनयानर्थख्यापनं दोषयोगेऽपि न निमित्तस्य प्रधानबाधकत्वम् ॥ ११६ ॥ अर्थ—जैसे वैराग्य में वासना कमती होकर अपना प्रभाव नहीं दिखा सकती, इसी तरह निद्रा-दोष के योग से भी वासना अपने विषय की ओर नहीं खींच सकती ; क्योंकि वासनाओं का निमित्त जो संस्कार है वह निद्रा के दोष से बाधित हो चुका है, इस वास्ते सुषुप्ति में भी समाधि की तरह आनन्द रहता है। पहले इस बात को कह चुके हैं कि संस्कार के लेश से जीवन्मुक्त शरीर बना सकता है । प्र०—जब संस्कार से शरीर बना रहता है वह एक ही संस्कार