सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १६८ ) प्र०-जब समाधि और सुषुप्ति में भी आनन्द प्राप्त होजाता है तो मुक्ति के लिये उपाय करने की क्या ज़रूरत है, और मुक्ति में अधिक कौनसी बात रही है ? उ०—द्वयोः सबीजमन्यत्र तद्धतिः ॥ ११७ ॥ अर्थ—समाधि और सुषुप्ति में जो आनन्द प्राप्त होता है वो थोड़े ही समय के लिये होता है और उसमें बन्ध भी बना रहता है । मोक्ष का आनन्द बहुत समय तक बना रहता और बंध का भी नाश हो जाता है, यह ही भेद समाधि और सुषुप्ति इन दो तरह के आनन्दों में और मोक्ष के आनन्द में है। प्र०-समाधि और सुषुप्ति यह दोनों प्रत्यक्ष दीखती है, परन्तु मोक्ष प्रत्यक्ष नहीं दीखता; इसलिये उसमें आनन्द न कहना चाहिये । उ०—द्वयोरिव त्रयस्यापि दृष्टत्वान्न तुह्रौ ॥११८ अर्थ—जैसे समाधि और सुषुप्ति यह दोनों प्रत्यक्ष दीखती , वैसे ही मोक्ष भी प्रत्यक्ष दीखता है । वह प्रत्यक्ष इस प्रकार होता है कि जबतक मनुष्य किसी कर्म को करके उसका फल नहीं भोग लेता है, तब तक उस कर्म के साधन करने के लिये उसकी नीयत नहीं होती ; जैसे—पहले भोजन कर चुके हैं तो दूसरे दिन भी भोजन करने के लिये उपाय किया जाता है। इसी तरह जब पहिले कभी जीव मोक्ष के सुख को जान चुका है तब फिर भी मोक्ष-सुख के लिये उपाय करने की नीयत होती है। यदि यह कहा जावै कि इस जन्म में जिस मनुष्य ने कभी राज्य-सुख नहीं भोगा है, परन्तु उसकी यह इच्छा रहती है कि राज्य का सुख प्राप्त हो । इसका यह उत्तर है कि राज्य में जो सुख होता है उस- को तो नेत्रों से देखते हैं । इससे यह साबित हुआ कि या तो मोक्ष