सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १६७ ) जाता है और वह मकानादि राजा के बनाये हुए हैं, इस प्रकार लोक में प्रसिद्ध होते हैं और उन मकानों का मालिक भी राजा ही है । इसी प्रकार पुरुष भी प्राण और इन्द्रियों के द्वारा शरीर को चलाता है, परन्तु अकेला आप नहीं चलाता और बिना उसके यह शरीर चल नहीं सकता, इससे वह अधिष्ठाता समझा जाता है । अब इस से आगे पुरुष का मुक्त दशा में स्वरूप आदि कहते हैं । समाधिसुषुप्तिमोक्षेषु ब्रह्मरूपता ॥ ११६ ॥ अर्थ—समाधि, सुषुप्ति और मोक्ष में पुरुष को ब्रह्मरूपता होजाती है अर्थात् जैसा ब्रह्म आनन्दस्वरूप है वैसे ही जीव भी आनन्दस्वरूप होजाता है । इस सूत्र का अर्थ और टीकाकारों ने ऐसा किया है कि समाधि, सुषुप्ति, मोक्ष, इन तीनों अवस्थाओं में जीव ब्रह्म हो जाता है, परन्तु ऐसा अर्थ करना ठीक नहीं है, क्योंकि रूप शब्द का सादृश्य अर्थ है, जैसा कि अमुक मनुष्य देव- स्वरूप है । इसके कहने से यह प्रयोजन सिद्ध होजाता है कि यह देव नहीं है, किन्तु देवताओं के-से उस में गुण हैं । ( विद्वांसोहि देवाः ) जो विद्वान है उनको ही देवता कहते हैं, इस बात को कह चुके हैं । इसी से उसको देवस्वरूप कहा गया । यदि देवता ही कहना स्वीकार होता तो अमुक मनुष्य देवता है इतना ही कहना योग्य था ; इसलिये इस कहे हुये सूत्र में भी ब्रह्मरूप कहने से यह प्रयोजन है कि जीव में ब्रह्म के-से कितने ही गुण इन अवस्थाओं में हो जाते हैं, परन्तु जीव ब्रह्म नहीं होजाता है । यदि आचार्य को भी यही बात स्वीकार होती कि उक्त जीव ब्रह्म हो जाता है तो ‘ब्रह्मरूपता’ न कहते, किंतु “ब्रह्मत्वम्” ऐसा कहते । जो ब्रह्म को और जीव को एक मानते हैं उनका मत इस ज्ञापक से दूषित हुआ ।